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श्लोक 9.23.35-36  |
ज्यामघस्त्वप्रजोऽप्यन्यां भार्यां शैब्यापतिर्भयात् ।
नाविन्दच्छत्रुभवनाद् भोज्यां कन्यामहारषीत् ।
रथस्थां तां निरीक्ष्याह शैब्या पतिममर्षिता ॥ ३५ ॥
केयं कुहक मत्स्थानं रथमारोपितेति वै ।
स्नुषा तवेत्यभिहिते स्मयन्ती पतिमब्रवीत् ॥ ३६ ॥ |
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| अनुवाद |
| ज्यामघ के कोई पुत्र नहीं थे, लेकिन वह अपनी पत्नी शैब्या से बहुत डरता था, इस वजह से उसने दूसरी शादी नहीं की। एक बार ज्यामघ किसी दूसरे राजा के शिविर से एक ऐसी लड़की को ले आया जो वेश्या थी। लेकिन जब शैब्या ने उसे देखा तो वह बहुत क्रोधित हो गई और उसने अपने पति से पूछा "यह लड़की कौन है जो रथ में मेरे आसन पर बैठी है?" तब ज्यामघ ने उत्तर दिया "यह लड़की तुम्हारी बहू बनेगी।" इन विनोदपूर्ण शब्दों को सुनकर शैब्या हँस पड़ी। |
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| ज्यामघ के कोई पुत्र नहीं थे, लेकिन वह अपनी पत्नी शैब्या से बहुत डरता था, इस वजह से उसने दूसरी शादी नहीं की। एक बार ज्यामघ किसी दूसरे राजा के शिविर से एक ऐसी लड़की को ले आया जो वेश्या थी। लेकिन जब शैब्या ने उसे देखा तो वह बहुत क्रोधित हो गई और उसने अपने पति से पूछा "यह लड़की कौन है जो रथ में मेरे आसन पर बैठी है?" तब ज्यामघ ने उत्तर दिया "यह लड़की तुम्हारी बहू बनेगी।" इन विनोदपूर्ण शब्दों को सुनकर शैब्या हँस पड़ी। |
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