शान्तिमाप्नोति चैवाग्र्यां कर्मणा तेन शान्तनु: ।
समा द्वादश तद्राज्ये न ववर्ष यदा विभु: ॥ १४ ॥
शान्तनुर्ब्राह्मणैरुक्त: परिवेत्तायमग्रभुक् ।
राज्यं देह्यग्रजायाशु पुरराष्ट्रविवृद्धये ॥ १५ ॥
अनुवाद
चूँकि राजा अपने हाथ के स्पर्श मात्र से ही सबों की इन्द्रियतृप्ति कर सुखी बना सकता था, इसीलिए उसका नाम शान्तनु था। एक बार जब राज्य में बारह वर्षों तक वर्षा नहीं हुई तो राजा ने विद्वान ब्राह्मणों से परामर्श किया। उन्होंने कहा, “तुम अपने बड़े भाई की सम्पत्ति भोगने के दोषी हो। अपने राज्य और घर की उन्नति के लिए यह राज्य उसे लौटा दो।”
Since this king was capable of satisfying the senses of all and making them happy with just a touch of his hand, he was named Shantanu. Once when there was no rain in the kingdom for twelve years, the king consulted learned Brahmins. They said, “You are guilty of enjoying the wealth of your elder brother. You should return this kingdom to him for the progress of your kingdom and your home.”
तात्पर्य
कोई भी अपने बड़े भाई की उपस्थिति में संप्रभुता का आनंद नहीं ले सकता है या अग्निहोत्र-यज्ञ नहीं कर सकता है, अन्यथा वह एक घुसपैठिया बन जाता है, जिसे परिवेट कह कर जाना जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥