श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 20: पूरु का वंश  »  श्लोक 24-26
 
 
श्लोक  9.20.24-26 
चक्रं दक्षिणहस्तेऽस्य पद्मकोशोऽस्य पादयो: ।
ईजे महाभिषेकेण सोऽभिषिक्तोऽधिराड् विभु: ॥ २४ ॥
पञ्चपञ्चाशता मेध्यैर्गङ्गायामनु वाजिभि: ।
मामतेयं पुरोधाय यमुनामनु च प्रभु: ॥ २५ ॥
अष्टसप्ततिमेध्याश्वान् बबन्ध प्रददद् वसु ।
भरतस्य हि दौष्मन्तेरग्नि: साचीगुणे चित: ।
सहस्रं बद्वशो यस्मिन् ब्राह्मणा गा विभेजिरे ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
दुष्मन्त के पुत्र महाराज भरत के दाहिने हाथ की हथेली पर भगवान कृष्ण के चक्र का चिह्न था और पैरों के तलवों में कमल कोश का चिह्न था। एक भव्य अनुष्ठान में भगवान की पूजा करके वे पूरे विश्व सम्राट और शासक बन गए। फिर मामतेय अर्थात भृगु मुनि के पौरोहित्य में गंगा नदी के तट पर गंगा के मुँह से लेकर उद्गम स्थान तक पचपन अश्वमेध यज्ञ किये। इसी प्रकार यमुना नदी के तट पर प्रयागराज के संगम से लेकर उद्गम स्थान तक अठहत्तर अश्वमेध यज्ञ किये। एक सर्वश्रेष्ठ यज्ञ स्थान पर यज्ञ की अग्नि स्थापित की और अपनी विपुल सम्पत्ति ब्राह्मणों में बाँट दी। यहाँ तक कि उन्होंने इतनी गाएँ दान में दी कि हजारों ब्राह्मणों में से प्रत्येक ब्राह्मण को एक बद्व (13084) गाएँ मिलीं।
 
Maharaja Bharata, son of Dusmanta, had the mark of Lord Krishna's discus on the palm of his right hand and the mark of a lotus pod on the soles of his feet. He became the ruler and emperor of the whole world by worshipping the Lord through great rituals. Then he performed fifty-five Ashwamedha Yajnas on the banks of the river Ganga from the last point of the river to its origin under the priesthood of Mamateya, that is, Bhrigu Muni. Similarly, he performed seventy-eight Ashwamedha Yajnas on the banks of the river Yamuna from the confluence of Prayagraj to its origin. He established the sacrificial fire at the best place and distributed his enormous wealth among the Brahmins. He donated so many cows that each one of the thousands of Brahmins got one Badwa (13084) cows as his share.
तात्पर्य
जैसा यहाँ ''दौष्मन्तेरग्निः साची-गुणे चिताः'' शब्दों द्वारा बताया गया है, महाराज दुष्यंत के पुत्र भरत ने विश्व भर में बहुत सारे अनुष्ठानों का आयोजन किया, विशेष रूप से पूरे भारत में गंगा और यमुना के तट पर उनके उद्गम से संगम तक, और ऐसे सभी यज्ञों को बहुत ही विशिष्ट स्थानों पर संपन्न कराया गया। जैसा कि भगवद् गीता (3.9) में लिखा गया है, ''यज्ञात्कर्मणोऎन्यत्र लोकोऎयम कर्म बंधनः'' अर्थात ''विष्णु के लिए किए गए यज्ञ कर्म अवश्य करने चाहिए; नहीं तो कर्म मनुष्य को इस भौतिक संसार से बाँध देते हैं।'' प्रत्येक मनुष्य को यज्ञ में भाग लेना चाहिए, और बलि वेदी की आग को हर जगह प्रज्वलित करना चाहिए, जिसका उद्देश्य लोगों को खुशहाल, समृद्ध और आध्यात्मिक जीवन में प्रगतिशील बनाना होता है। निश्चित रूप से, ये चीजें कली युग के आरम्भ से पहले संभव थीं क्योंकि योग्य ब्राह्मण थे जो ऐसे यज्ञों को संपन्न कर सकते थे। हालाँकि, ब्रह्मा ववैवर्त पुराण वर्तमान समय के लिए आज्ञा देता है कि:

''अश्वमेधं गवांलम्भं

सन्यासं पलपैत्रिकम्

देवरेण सुतोत्पत्तिं

कलौ पंच विवर्जयेत''

''इस कली युग में पाँच कार्य वर्जित हैं: अश्वमेध यज्ञ, गौमेध यज्ञ, सन्यास आश्रम ग्रहण करना, पितरों को मांसाहारी भोजन अर्पित करना और देवर की पत्नी से संतान उत्पन्न करना।'' इस युग में, अश्वमेध यज्ञ तथा गौमेध यज्ञ जैसे यज्ञों को करना असंभव है क्योंकि न तो इसके लिए पर्याप्त धन है और न ही योग्य ब्राह्मण हैं। यह श्लोक कहता है, ''मामतेयं पुरोधाय:'' महाराज भरत ने इस यज्ञ के अनुष्ठान की जिम्मेदारी मामता के पुत्र भृगु मुनि को दी थी। हालाँकि, अब ऐसे ब्राह्मणों को ढूंढना असंभव है। इसलिए शास्त्रों में अनुशंसा की गई है कि, ''यज्ञैः संकीर्तन प्रायैर्यजंति हि सुमेधसः'' अर्थात जो बुद्धिमान होते हैं उन्हें भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रारंभ किए गए ''संकीर्तन यज्ञ'' को करना चाहिए।

''कृष्ण वर्णं त्विषाकृष्णं

संगोपांगास्त्र पार्षदम्

यज्ञैः संकीर्तन प्रायैर्यजंति हि सुमेधसः''

''इस कली युग में, पर्याप्त बुद्धि संपन्न लोग संकीर्तन यज्ञ के द्वारा भगवान की, जो अपने सहयोगियों के साथ होते हैं, उपासना करेंगे।'' (भागवत 11.5.32) यज्ञ अवश्य संपन्न करना चाहिए, अन्यथा लोग पाप कर्मों में फँसकर अत्यधिक कष्ट उठाएँगे। इसलिए कृष्ण भावना आंदोलन ने पूरे विश्व में हरे कृष्ण नाम जप शुरू करने की ज़िम्मेदारी ली है। यह हरे कृष्ण आंदोलन भी यज्ञ है, लेकिन इसमें साज़ो सामान की व्यवस्था करने और योग्य ब्राह्मणों की व्यवस्था करने की किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं होती है। यह सामूहिक जप कहीं भी और हर जगह किया जा सकता है। यदि लोग किसी भी प्रकार से एकत्रित होते हैं और उन सभी को हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे/हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे का जाप करने के लिए प्रेरित किया जाता है, तो यज्ञ के सभी उद्देश्य पूर्ण हो जाएँगे। पहला उद्देश्य यह है कि पर्याप्त वर्षा होनी चाहिए, क्योंकि वर्षा के बिना अन्नोत्पादन नहीं हो सकता है (अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्याद् अन्न संभवः)। हमारी सभी ज़रूरतें सिर्फ वर्षा के पानी से ही पूरी हो सकती हैं (कामं ववर्षः पर्जन्यः) और पृथ्वी हमारी सभी ज़रूरतों का मूल स्रोत है (सर्व काम दुघा मही)। इसलिए अंत में, इस कली युग में पूरे विश्व में लोगों को पापमय जीवन के चार सिद्धांतों - अवैध यौन संबंध, मांसाहार, नशा और जुआ - से बचना चाहिए, और अपने अस्तित्व की शुद्ध अवस्था में हरे कृष्ण महामंत्र का जप करने का सरल यज्ञ करना चाहिए। तब पृथ्वी यह निश्चित रूप से जीवन के लिए सभी ज़रूरतों को पूरा करेगी, और लोग आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से खुशहाल रहेंगे। सब कुछ उचित व्यवस्था में होगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)