''अश्वमेधं गवांलम्भं
सन्यासं पलपैत्रिकम्
देवरेण सुतोत्पत्तिं
कलौ पंच विवर्जयेत''
''इस कली युग में पाँच कार्य वर्जित हैं: अश्वमेध यज्ञ, गौमेध यज्ञ, सन्यास आश्रम ग्रहण करना, पितरों को मांसाहारी भोजन अर्पित करना और देवर की पत्नी से संतान उत्पन्न करना।'' इस युग में, अश्वमेध यज्ञ तथा गौमेध यज्ञ जैसे यज्ञों को करना असंभव है क्योंकि न तो इसके लिए पर्याप्त धन है और न ही योग्य ब्राह्मण हैं। यह श्लोक कहता है, ''मामतेयं पुरोधाय:'' महाराज भरत ने इस यज्ञ के अनुष्ठान की जिम्मेदारी मामता के पुत्र भृगु मुनि को दी थी। हालाँकि, अब ऐसे ब्राह्मणों को ढूंढना असंभव है। इसलिए शास्त्रों में अनुशंसा की गई है कि, ''यज्ञैः संकीर्तन प्रायैर्यजंति हि सुमेधसः'' अर्थात जो बुद्धिमान होते हैं उन्हें भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रारंभ किए गए ''संकीर्तन यज्ञ'' को करना चाहिए।
''कृष्ण वर्णं त्विषाकृष्णं
संगोपांगास्त्र पार्षदम्
यज्ञैः संकीर्तन प्रायैर्यजंति हि सुमेधसः''
''इस कली युग में, पर्याप्त बुद्धि संपन्न लोग संकीर्तन यज्ञ के द्वारा भगवान की, जो अपने सहयोगियों के साथ होते हैं, उपासना करेंगे।'' (भागवत 11.5.32) यज्ञ अवश्य संपन्न करना चाहिए, अन्यथा लोग पाप कर्मों में फँसकर अत्यधिक कष्ट उठाएँगे। इसलिए कृष्ण भावना आंदोलन ने पूरे विश्व में हरे कृष्ण नाम जप शुरू करने की ज़िम्मेदारी ली है। यह हरे कृष्ण आंदोलन भी यज्ञ है, लेकिन इसमें साज़ो सामान की व्यवस्था करने और योग्य ब्राह्मणों की व्यवस्था करने की किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं होती है। यह सामूहिक जप कहीं भी और हर जगह किया जा सकता है। यदि लोग किसी भी प्रकार से एकत्रित होते हैं और उन सभी को हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे/हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे का जाप करने के लिए प्रेरित किया जाता है, तो यज्ञ के सभी उद्देश्य पूर्ण हो जाएँगे। पहला उद्देश्य यह है कि पर्याप्त वर्षा होनी चाहिए, क्योंकि वर्षा के बिना अन्नोत्पादन नहीं हो सकता है (अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्याद् अन्न संभवः)। हमारी सभी ज़रूरतें सिर्फ वर्षा के पानी से ही पूरी हो सकती हैं (कामं ववर्षः पर्जन्यः) और पृथ्वी हमारी सभी ज़रूरतों का मूल स्रोत है (सर्व काम दुघा मही)। इसलिए अंत में, इस कली युग में पूरे विश्व में लोगों को पापमय जीवन के चार सिद्धांतों - अवैध यौन संबंध, मांसाहार, नशा और जुआ - से बचना चाहिए, और अपने अस्तित्व की शुद्ध अवस्था में हरे कृष्ण महामंत्र का जप करने का सरल यज्ञ करना चाहिए। तब पृथ्वी यह निश्चित रूप से जीवन के लिए सभी ज़रूरतों को पूरा करेगी, और लोग आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से खुशहाल रहेंगे। सब कुछ उचित व्यवस्था में होगा।
