श्रवणं कीर्तनं विष्णोः
स्मरणं पा़द-सेवनम
अर्चनं वन्दनं दास्यं
सख्यं आत्म-निवेदनम्
"भगवान विष्णु के अलौकिक पवित्र नाम, रूप, गुण, उपकरण और लीलाओं के बारे में सुनना और उनका कीर्तन करना, उन्हें याद करना, भगवान के चरण-कमलों की सेवा करना, भगवान की पूजा सम्मानपूर्वक करना, भगवान के प्रति प्रार्थनाएं करना, उनका सेवक बनना, भगवान को अपना सबसे अच्छा मित्र मानना और सब कुछ उनके प्रति समर्पित करना - इन नौ प्रक्रियाओं को शुद्ध भक्ति सेवा के रूप में स्वीकार किया जाता है।" (भाग. 7.5.23) श्रवणं कीर्तनम, अर्थात् सुनना और कीर्तन करना, विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। अपने पति से भगवान वासुदेव की महानता के बारे में सुनकर, निश्चित रूप से देवयानी आश्वस्त हो गई और स्वयं को भगवान के चरण-कमलों (ओम नमो भगवते वासुदेवाय) में समर्पित कर दिया। यह ज्ञान है। बहुनाम जन्मनाम अन्ते ज्ञानवान् माम प्रपद्यते। वासुदेव के प्रति समर्पण कई जन्मों से उनके बारे में सुनने का परिणाम है। जैसे ही कोई वासुदेव के प्रति समर्पण करता है, वह तुरंत मुक्त हो जाता है। अपने महान पति महाराज ययाति के साथ अपने जुड़ाव के कारण, देवयानी पवित्र हो गईं, भक्ति-योग के साधन को अपनाया और इस प्रकार मुक्त हो गईं।
