श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 19: राजा ययाति को मुक्ति-लाभ  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  9.19.29 
नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय वेधसे ।
सर्वभूताधिवासाय शान्ताय बृहते नम: ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
हे भगवान वासुदेव, हे परमपुरुषोत्तम परमेश्वर, आप समस्त विशाल जगत के स्रष्टा हैं। आप सभी के हृदय में परमात्मा रूप में निवास करते हैं और सूक्ष्म से भी सूक्ष्म होते हुए भी विशाल से भी विशाल हैं और सर्वव्यापी हैं। आप परम शांत लगते हैं, मानो आपको कुछ करना-धरना नहीं है, लेकिन ऐसा आपके सर्वव्यापक स्वभाव और सर्व ऐश्वर्य से पूर्ण होने के कारण है। अतएव मैं आपको नमन करती हूँ।
 
O Lord Vasudeva, O Supreme Personality of Godhead, You are the creator of the entire cosmic universe. You reside in the heart of everyone as the Supersoul and though You are the smallest of all, You are the greatest of all and are omnipresent. You appear supremely peaceful, as if You have nothing to do, but this is due to Your omnipresent nature and being full of all opulence. Therefore, I offer my respectful obeisances unto You.
तात्पर्य
यहां बताया गया है कि अपने महापति महाराज ययाति की कृपा से देवयानी ने किस प्रकार आत्म-साक्षात्कार प्राप्त किया। इस तरह की साक्षात्कार प्रतिपादित करना भक्ति प्रक्रिया को करने का एक और तरीका है।

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः

स्मरणं पा़द-सेवनम

अर्चनं वन्दनं दास्यं

सख्यं आत्म-निवेदनम्

"भगवान विष्णु के अलौकिक पवित्र नाम, रूप, गुण, उपकरण और लीलाओं के बारे में सुनना और उनका कीर्तन करना, उन्हें याद करना, भगवान के चरण-कमलों की सेवा करना, भगवान की पूजा सम्मानपूर्वक करना, भगवान के प्रति प्रार्थनाएं करना, उनका सेवक बनना, भगवान को अपना सबसे अच्छा मित्र मानना और सब कुछ उनके प्रति समर्पित करना - इन नौ प्रक्रियाओं को शुद्ध भक्ति सेवा के रूप में स्वीकार किया जाता है।" (भाग. 7.5.23) श्रवणं कीर्तनम, अर्थात् सुनना और कीर्तन करना, विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। अपने पति से भगवान वासुदेव की महानता के बारे में सुनकर, निश्चित रूप से देवयानी आश्वस्त हो गई और स्वयं को भगवान के चरण-कमलों (ओम नमो भगवते वासुदेवाय) में समर्पित कर दिया। यह ज्ञान है। बहुनाम जन्मनाम अन्ते ज्ञानवान् माम प्रपद्यते। वासुदेव के प्रति समर्पण कई जन्मों से उनके बारे में सुनने का परिणाम है। जैसे ही कोई वासुदेव के प्रति समर्पण करता है, वह तुरंत मुक्त हो जाता है। अपने महान पति महाराज ययाति के साथ अपने जुड़ाव के कारण, देवयानी पवित्र हो गईं, भक्ति-योग के साधन को अपनाया और इस प्रकार मुक्त हो गईं।

 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध नौ के अंतर्गत उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)