श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 19: राजा ययाति को मुक्ति-लाभ  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  9.19.24 
आसेवितं वर्षपूगान् षड्‍वर्गं विषयेषु स: ।
क्षणेन मुमुचे नीडं जातपक्ष इव द्विज: ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजा परीक्षित, ययाति ने अनेकानेक वर्षों तक विषयों का उपभोग किया, क्योंकि वे इसके आदी थे, लेकिन उन्होंने एक क्षण में अपना सब कुछ त्याग दिया, ठीक उसी प्रकार जैसे पक्षी के पंख निकलते ही वह अपने घोंसले से उड़ जाता है।
 
O King Parīkṣit, Yayāti indulged in sensual pleasures for many, many years because he was addicted to them, but he renounced everything in a moment, just as a bird flies from its nest as soon as it grows wings.
तात्पर्य
महाराज ययाति अवश्य ही कंडिशंड जीवन के बंधन से तुरंत ही मुक्त हो गए थे। यह निश्चित रूप से आश्चर्यजनक है। लेकिन यहाँ दिया गया उदाहरण उपयुक्त है। एक छोटा सा पक्षी अपने पिता और माँ पर पूरी तरह से आश्रित है, यहां तक कि अपने खाने के लिए भी। लेकिन जब उसके पंख बढ़ जाते है, तो अचानक ही अपने घोंसले से उड़ जाता है। इसी तरह, यदि कोई परमपुरुष भगवान के प्रति पूर्ण रूप से समर्पण करता है, तो वह तुरंत ही कंडीशंड जीवन के बंधनों से मुक्त हो जाता है, जैसा कि स्वयं भगवान ने वादा किया है (अहं त्वां सर्व-पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि)। जैसा कि श्रीमद्भागवतम् (2.4. 18) में कहा गया है:

किरात हुणाँध्र पुलिंद पुलकसा

आभीर शुम्भा यवनाः खसादयः

ये अन्ये च पापा यद-पाश्रयाश्रयाः

शुध्यंति तस्मै प्रभविष्णवे नमः

'किरात, हूण, आंध्र, पुलिंद, पुलकश, आभीर, शुम्भ, यवन और खस नस्लों और यहां तक कि पापपूर्ण कृत्यों के आदी अन्य लोगों को भी भगवान के भक्तों की शरण लेने से शुद्ध किया जा सकता है, क्योंकि वह सर्वोच्च शक्ति हैं। मैं उन्हें अपना विनम्र प्रणाम भेजता हूँ।' भगवान विष्णु इतने शक्तिशाली हैं कि यदि वह चाहें तो वह किसी को भी तुरंत मुक्त कर सकते हैं। और भगवान विष्णु, परमपुरुष भगवान कृष्ण, तुरंत प्रसन्न हो सकते हैं यदि हम उनके आदेश को स्वीकार करते हैं और उनके प्रति समर्पित हो जाते हैं, जैसा कि महाराज ययाति ने किया था। महाराज ययाति वासुदेव, कृष्ण की सेवा करने के लिए उत्सुक थे, और इसलिए जैसे ही उन्होंने भौतिक जीवन को त्यागने की इच्छा की, भगवान वासुदेव ने उनकी मदद की। इसलिए हमें भगवान के चरण कमलों में अपने आप को समर्पित करने में बहुत ईमानदार होना चाहिए। तब हम तुरंत कंडीशंड जीवन के सभी बंधनों से मुक्त हो सकते हैं। यह अगले श्लोक में स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)