श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 19: राजा ययाति को मुक्ति-लाभ  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  9.19.2 
श‍ृणु भार्गव्यमूं गाथां मद्विधाचरितां भुवि ।
धीरा यस्यानुशोचन्ति वने ग्रामनिवासिन: ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
हे मेरी प्यारी पत्नी और शुक्राचार्य की पुत्री, इस दुनिया में कोई ऐसा था जो बिल्कुल मेरे जैसा था। कृपया मेरे द्वारा सुनाई जा रही उसकी जीवनगाथा सुनो। ऐसे गृहस्थ के जीवन के विषय में सुनकर वे लोग हमेशा पछताते हैं जिन्होंने गृहस्थ जीवन से वैराग्य ले लिया है।
 
O my dear wife and daughter of Shukracharya, there was someone just like me in this world. Listen to the story of his life which I am telling. Those who have taken renunciation from the domestic life always regret after hearing about the life of such a householder.
तात्पर्य
जो लोग गांव या नगर में रहते हैं उन्हें ग्राम-निवासी कहा जाता है, और जो लोग जंगल में रहते हैं उन्हें वन-वासी या वानप्रस्थ कहा जाता है। वानप्रस्थ, जो कि पारिवारिक जीवन से सेवानिवृत्त हो चुके होते हैं, अक्सर अपने पिछले पारिवारिक जीवन के बारे में विलाप करते हैं क्योंकि इसने उन्हें वासनाओं को पूरा करने का प्रयास करने में उलझाए रखा था। प्रह्लाद महाराज ने कहा कि व्यक्ति को जल्द से जल्द पारिवारिक जीवन से सेवानिवृत्त हो जाना चाहिए, और उन्होंने पारिवारिक जीवन को सबसे गहरा कुआं (हत्वात्मा-पातं ग्रह्म अंध-कूपम) बताया। यदि कोई लगातार या स्थायी रूप से अपने परिवार के साथ रहने पर ध्यान केंद्रित करता है, तो उसे खुद को मारने वाला समझा जाना चाहिए। इसलिए वैदिक सभ्यता में यह अनुशंसा की गई है कि अपने पचासवें वर्ष के अंत में व्यक्ति गृहस्थ जीवन से सेवानिवृत्त हो जाए और वन, जंगल में जाए। जब वह वन जीवन, या एक वानप्रस्थ के रूप में सेवानिवृत्त जीवन का विशेषज्ञ या अभ्यस्त हो जाता है, तो उसे सन्यास स्वीकार करना चाहिए। वनं गतो यद्धरिमाश्रयेता। सन्यास का अर्थ है भगवान की सेवा में अविभाजित रूप से संलग्न होना। इसलिए वैदिक सभ्यता जीवन के चार अलग-अलग चरणों की अनुशंसा करती है - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास। गृहस्थ रहने और स्वयं को वानप्रस्थ और सन्यास जैसे दो उच्च चरणों में नहीं बढ़ाने के लिए किसी को बहुत शर्म आनी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)