यदवधि मम चेतः कृष्ण-पादारविन्दे
नव-नव-रस-धामन्युद्यतं रन्तुं आसित
तदवधि बतनारी-संगमे स्मर्यमाणे
भवति मुख विकारः सुष्टु निष्ठीवनं च।
जब कोई कृष्ण भावना में होता है, कृष्ण की सेवा करने से उसे अधिक से अधिक सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति इंद्रियसुखों, विशेषतः यौन सुखों पर थूकता है। एक अनुभवी, उन्नत भक्त को अब यौन जीवन में कोई रुचि नहीं होती। यौन सुख की प्रबल इच्छा को कृष्ण भावना में उन्नति करके ही दबाया जा सकता है।
