श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 19: राजा ययाति को मुक्ति-लाभ  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  9.19.16 
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्जीर्यतो या न जीर्यते ।
तां तृष्णां दु:खनिवहां शर्मकामो द्रुतं त्यजेत् ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
जो लोग भौतिक सुखों में बहुत अधिक लिप्त रहते हैं, उनके लिए इंद्रियों की संतुष्टि का त्याग करना बहुत कठिन होता है। यहाँ तक कि वृद्धावस्था के कारण बीमार व्यक्ति भी इंद्रिय संतुष्टि की इच्छाओं को नहीं त्याग पाता। इसलिए, जो वास्तव में सुख चाहता है, उसे ऐसी अप्राप्त इच्छाओं को त्याग देना चाहिए क्योंकि ये सभी कष्टों की जड़ हैं।
 
It is very difficult for those who are overly involved in material enjoyment to give up sense gratification. Even a person who is infirm due to old age cannot give up such desires for sense gratification. Therefore, one who really wants happiness must give up such unsatisfied desires, because these are the root of all suffering.
तात्पर्य
हमें विशेषतः पाश्चात्य देशों में यह देखा गया है कि जो मनुष्य अस्सी साल से ज़्यादा उम्र के हो जाते हैं, वे फिर भी नाइटक्लब में जाते हैं और बहुत ज़्यादा शुल्क देकर शराब पीते हैं और महिलाओं के साथ समय बिताते हैं। यद्यपि ऐसे पुरुष किसी चीज़ का आनंद लेने के लिए बहुत बूढ़े होते हैं, उनकी कामनाएँ मिट नहीं पाती हैं। समय शरीर को भी ख़राब कर देता है, जो कि सभी इंद्रिय सुखों का साधन है। पर जब मनुष्य बूढ़ा और अशक्त हो जाता है तब भी उसकी कामनाएँ उसे इधर-उधर घुमाने के लिए काफ़ी मज़बूत होती हैं ताकि वह अपनी इंद्रियों की कामनाओं को पूरा कर सके। इसीलिए भक्ति योग का अभ्यास करके मनुष्य को अपनी कामुक कामनाओं को त्याग देना चाहिए। जैसा कि श्री यमुनाचार्य ने समझाया है:

यदवधि मम चेतः कृष्ण-पादारविन्दे

नव-नव-रस-धामन्युद्यतं रन्तुं आसित

तदवधि बतनारी-संगमे स्मर्यमाणे

भवति मुख विकारः सुष्टु निष्ठीवनं च।

जब कोई कृष्ण भावना में होता है, कृष्ण की सेवा करने से उसे अधिक से अधिक सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति इंद्रियसुखों, विशेषतः यौन सुखों पर थूकता है। एक अनुभवी, उन्नत भक्त को अब यौन जीवन में कोई रुचि नहीं होती। यौन सुख की प्रबल इच्छा को कृष्ण भावना में उन्नति करके ही दबाया जा सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)