| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 9: मुक्ति » अध्याय 19: राजा ययाति को मुक्ति-लाभ » श्लोक 13 |
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| | | | श्लोक 9.19.13  | यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशव: स्त्रिय: ।
न दुह्यन्ति मन:प्रीतिं पुंस: कामहतस्य ते ॥ १३ ॥ | | | | | | अनुवाद | | कामी पुरुष का सदा असंतुष्ट मन कभी नहीं भरता। चाहें उसे संसार की सारी वस्तुओं की प्रचुरता ही क्यों न मिल जाये जैसे कि धान, जौ, अन्य अन्न, सोना, पशु और स्त्रियाँ आदि। उसे किसी भी चीज़ से सन्तोष नहीं होता। | | | | कामी पुरुष का सदा असंतुष्ट मन कभी नहीं भरता। चाहें उसे संसार की सारी वस्तुओं की प्रचुरता ही क्यों न मिल जाये जैसे कि धान, जौ, अन्य अन्न, सोना, पशु और स्त्रियाँ आदि। उसे किसी भी चीज़ से सन्तोष नहीं होता। | | ✨ ai-generated | | |
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