एक बेटा जो अपने पिता की इच्छा को पहले से समझकर उसी के अनुसार कार्य करता है, वह प्रथम श्रेणी का (उत्तम) होता है; जो अपने पिता की आज्ञा पाकर कार्य करता है, वह द्वितीय श्रेणी का (मध्यम) होता है; और जो बेटा अपने पिता के आदेश का पालन अपमानजनक रूप से करता है, वह तृतीय श्रेणी का (अधम) होता है।
“The son who knows his father's wish and acts accordingly is of the first category (best); the one who acts after getting his father's orders is of the second category (medium); and the son who disrespectfully follows his father's orders is of the third category (wretched). But the son who disobeys his father's orders is like his father's excrement.”
तात्पर्य
पुरु, ययाति का अंतिम पुत्र, ने अपने पिता के प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया, हालाँकि वह सबसे छोटा था, वह बहुत योग्य था। पुरु ने सोचा, "मुझे अपने पिता के प्रस्ताव को उनके पूछने से पहले ही स्वीकार कर लेना चाहिए था, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। इसलिए मैं प्रथम श्रेणी का पुत्र नहीं हूँ। मैं द्वितीय श्रेणी का हूँ। लेकिन मैं सबसे निम्न श्रेणी का पुत्र नहीं बनना चाहता, जिसकी तुलना अपने पिता के मल से की जाती है।" एक भारतीय कवि ने पुत्र और मूत्र के बारे में बात की है। पुत्र का अर्थ है "पुत्र," और मूत्र का अर्थ है "मूत्र।" एक पुत्र और मूत्र दोनों एक ही जननांगों से आते हैं। यदि पुत्र प्रभु का आज्ञाकारी भक्त है तो उसे पुत्र या वास्तविक पुत्र कहा जाता है; अन्यथा, यदि वह शिक्षित नहीं है और भक्त नहीं है, तो पुत्र मूत्र से बेहतर कुछ नहीं है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥