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bhagavat 9.18.41: हे महाराज परीक्षित, ययाति ने इसी प्रकार सेतुर्वसु, द्रुह्यु और अनु नामक अन्य पुत्रों से भी उनकी जवानी के बदले अपनी वृद्धावस्था लेने का निवेदन किया। लेकिन वे सब अधर्मज्ञ थे, इसलिए उन्होंने सोचा कि उनकी नाशवान जवानी शाश्वत है। अतः उन्होंने अपने पिता के आदेश को मानने से इनकार कर दिया।   |   bhagavat अध्याय 9.18: राजा ययाति को यौवन की पुन:प्राप्ति   ।   bhagavat स्कन्ध 9: मुक्ति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 18: राजा ययाति को यौवन की पुन:प्राप्ति  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  9.18.41 
तुर्वसुश्चोदित: पित्रा द्रुह्युश्चानुश्च भारत ।
प्रत्याचख्युरधर्मज्ञा ह्यनित्ये नित्यबुद्धय: ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
हे महाराज परीक्षित, ययाति ने इसी प्रकार सेतुर्वसु, द्रुह्यु और अनु नामक अन्य पुत्रों से भी उनकी जवानी के बदले अपनी वृद्धावस्था लेने का निवेदन किया। लेकिन वे सब अधर्मज्ञ थे, इसलिए उन्होंने सोचा कि उनकी नाशवान जवानी शाश्वत है। अतः उन्होंने अपने पिता के आदेश को मानने से इनकार कर दिया।
 
O King Pariksit, Yayati similarly requested his other sons, Seturvasu, Druhyu and Anu, to give their youth in exchange for old age, but they were all irreligious and thought that their perishable youth was eternal and refused to obey their father's command.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)