श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 18: राजा ययाति को यौवन की पुन:प्राप्ति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  9.18.17 
एवंविधै: सुपरुषै: क्षिप्‍त्वाचार्यसुतां सतीम् ।
शर्मिष्ठा प्राक्षिपत् कूपे वासश्चादाय मन्युना ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
ऐसी कटु वचनों का प्रयोग करते हुए शर्मिष्ठा ने शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी को डाँटा। क्रोध में उसने देवयानी के वस्त्र छीन लिए और उसे एक कुएँ में डाल दिया।
 
Using such unpleasant words, Sharmishtha rebuked Devayani, the daughter of Shukracharya. In anger, she snatched away Devayani's clothes and pushed her into a well.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)