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श्लोक 9.17.13  |
देवैरभ्यर्थितो दैत्यान् हत्वेन्द्रायाददाद् दिवम् ।
इन्द्रस्तस्मै पुनर्दत्त्वा गृहीत्वा चरणौ रजे: ।
आत्मानमर्पयामास प्रह्रादाद्यरिशङ्कित: ॥ १३ ॥ |
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| अनुवाद |
| देवताओं की प्रार्थना पर रजी ने दैत्यों का वध कर स्वर्ग का राज्य वापस इंद्र को सौंप दिया। किन्तु इंद्र प्रह्लाद जैसे दैत्यों से डरकर वापस स्वर्ग का राज्य रजी को लौटा दिया और स्वंय उनके चरणों में आश्रय लिया। |
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| देवताओं की प्रार्थना पर रजी ने दैत्यों का वध कर स्वर्ग का राज्य वापस इंद्र को सौंप दिया। किन्तु इंद्र प्रह्लाद जैसे दैत्यों से डरकर वापस स्वर्ग का राज्य रजी को लौटा दिया और स्वंय उनके चरणों में आश्रय लिया। |
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