श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 15: भगवान् का योद्धा अवतार, परशुराम  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  9.15.5-6 
तस्य सत्यवतीं कन्यामृचीकोऽयाचत द्विज: ।
वरं विसद‍ृशं मत्वा गाधिर्भार्गवमब्रवीत् ॥ ५ ॥
एकत: श्यामकर्णानां हयानां चन्द्रवर्चसाम् ।
सहस्रं दीयतां शुल्कं कन्याया: कुशिका वयम् ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
राजा गाधि की एक पुत्री थी जिसका नाम सत्यवती था। एक बार ऋचीक नाम के ब्रह्मर्षि ने राजा से अपनी पुत्री सत्यवती से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की। किन्तु राजा गाधि ने ऋचीक को अपनी पुत्री के लायक नहीं समझा और कहा, "महोदय, मैं कुशवंशी हूँ। हम राजसी क्षत्रिय हैं। इसलिए आपको मेरी पुत्री के लिए कुछ दहेज देना होगा। कम से कम एक हजार ऐसे घोड़े लायें जो चाँदनी की तरह उज्ज्वल हों और जिनके एक कान, दायाँ या बायाँ, काला हो।"
 
राजा गाधि की एक पुत्री थी जिसका नाम सत्यवती था। एक बार ऋचीक नाम के ब्रह्मर्षि ने राजा से अपनी पुत्री सत्यवती से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की। किन्तु राजा गाधि ने ऋचीक को अपनी पुत्री के लायक नहीं समझा और कहा, "महोदय, मैं कुशवंशी हूँ। हम राजसी क्षत्रिय हैं। इसलिए आपको मेरी पुत्री के लिए कुछ दहेज देना होगा। कम से कम एक हजार ऐसे घोड़े लायें जो चाँदनी की तरह उज्ज्वल हों और जिनके एक कान, दायाँ या बायाँ, काला हो।"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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