| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 9: मुक्ति » अध्याय 15: भगवान् का योद्धा अवतार, परशुराम » श्लोक 41 |
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| | | | श्लोक 9.15.41  | राज्ञो मूर्धाभिषिक्तस्य वधो ब्रह्मवधाद् गुरु: ।
तीर्थसंसेवया चांहो जह्यङ्गाच्युतचेतन: ॥ ४१ ॥ | | | | | | अनुवाद | | हे प्यारे पुत्र, एक सम्राट की हत्या ब्राह्मण की हत्या से भी ज़्यादा पापपूर्ण होती है। परन्तु अब यदि तुम कृष्णभक्त बन जाओ और पवित्र स्थानों की पूजा करो, तो तुम इस बड़े पाप का प्रायश्चित कर सकते हो। | | | | हे प्यारे पुत्र, एक सम्राट की हत्या ब्राह्मण की हत्या से भी ज़्यादा पापपूर्ण होती है। परन्तु अब यदि तुम कृष्णभक्त बन जाओ और पवित्र स्थानों की पूजा करो, तो तुम इस बड़े पाप का प्रायश्चित कर सकते हो। | | | | इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध नौ के अंतर्गत पंद्रहवाँ अध्याय समाप्त होता है । | | | | ✨ ai-generated | | |
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