श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 12: भगवान् रामचन्द्र के पुत्र कुश की वंशावली  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  9.12.3-4 
सगणस्तत्सुतस्तस्माद् विधृतिश्चाभवत् सुत: ।
ततो हिरण्यनाभोऽभूद् योगाचार्यस्तु जैमिने: ॥ ३ ॥
शिष्य: कौशल्य आध्यात्मं याज्ञवल्‍क्योऽध्यगाद् यत: ।
योगं महोदयम् ऋषिर्हृदयग्रन्थिभेदकम् ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
वज्रनाभ के पुत्र का नाम सगण था और सगण के पुत्र का नाम विधृति था। विधृति का पुत्र हिरण्यनाभ हुआ, जो जैमिनि का शिष्य और बाद में योग का एक महान आचार्य बना। इन्हीं हिरण्यनाभ से महर्षि याज्ञवल्क्य ने अध्यात्म योग नामक योग की उच्चतम प्रणाली का ज्ञान प्राप्त किया। यह योग हृदय के भौतिक आसक्ति की गाँठ को खोलने में सक्षम है।
 
वज्रनाभ के पुत्र का नाम सगण था और सगण के पुत्र का नाम विधृति था। विधृति का पुत्र हिरण्यनाभ हुआ, जो जैमिनि का शिष्य और बाद में योग का एक महान आचार्य बना। इन्हीं हिरण्यनाभ से महर्षि याज्ञवल्क्य ने अध्यात्म योग नामक योग की उच्चतम प्रणाली का ज्ञान प्राप्त किया। यह योग हृदय के भौतिक आसक्ति की गाँठ को खोलने में सक्षम है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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