श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 11: भगवान् रामचन्द्र का विश्व पर राज्य करना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  9.11.6 
अप्रत्तं नस्त्वया किं नु भगवन् भुवनेश्वर ।
यन्नोऽन्तर्हृदयं विश्य तमो हंसि स्वरोचिषा ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, आप सारे जगत के स्वामी हैं। आपने हमें वह सब दिया है जिसकी हमें आवश्यकता है। आपने हमारे हृदयों में प्रवेश किया और अपने प्रकाश से हमारे अज्ञानता के अंधेरे को दूर किया। यही सबसे बड़ा उपहार है। हमें किसी भौतिक दान की आवश्यकता नहीं है।
 
O Lord, you are the master of the whole universe. What have you not given us? You have entered our hearts and dispelled the darkness of our ignorance with your radiance. That is the greatest gift. We do not need material gifts.
तात्पर्य
जब ध्रुव महाराज को भगवान ने वरदान देने की पेशकश की, तो उन्होंने उत्तर दिया, "हे मेरे भगवान, मैं पूरी तरह से संतुष्ट हूँ। मुझे किसी भौतिक वरदान की आवश्यकता नहीं है।" इसी तरह, जब प्रह्लाद महाराज को भगवान नृसिंह द्वारा वरदान की पेशकश की गई, तो उन्होंने भी उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया और इसके बजाय यह घोषित किया कि एक भक्त को वणिक, एक व्यापारी व्यक्ति की तरह नहीं होना चाहिए जो कुछ लाभ के बदले में कुछ देता है। जो भौतिक लाभ के लिए भक्त बनता है वह शुद्ध भक्त नहीं होता। ब्राह्मण हमेशा हृदय में भगवान द्वारा प्रबुद्ध होते हैं (सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर् ज्ञानं अपोहनं च)। और क्योंकि ब्राह्मण और वैष्णव हमेशा भगवान द्वारा निर्देशित होते हैं, वे भौतिक संपदा के लालची नहीं होते। जो बिल्कुल आवश्यक होता है, वही उनके पास होता है, लेकिन वे विस्तारित राज्य नहीं चाहते। इसका एक उदाहरण वामनदेव ने दिया था। ब्रह्मचारी के रूप में अभिनय करते हुए, भगवान वामनदेव केवल तीन कदम भूमि चाहते थे। व्यक्तिगत इंद्रिय संतुष्टि के लिए अधिक से अधिक संपत्ति रखने की इच्छा करना केवल अज्ञान है, और इस अज्ञानता की गैरहाजिरी ब्राह्मण या वैष्णव के हृदय से स्पष्ट होती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)