शमो दमस तपः शौचं
क्षांतिरार्जवं एव च
ज्ञानं विज्ञानम आस्तिक्यं
ब्रह्म-कर्म स्वभावजम
"शांतिपूर्णता, आत्म-संयम, तपस्या, पवित्रता, सहिष्णुता, ईमानदारी, ज्ञान, विवेक और धार्मिकता - ये वे गुण हैं जिनके द्वारा ब्राह्मण कार्य करते हैं।" ब्राह्मण चरित्र भूमि पर अधिकार करने और नागरिकों पर शासन करने की गुंजाइश प्रदान नहीं करता है; ये क्षत्रिय के कर्तव्य हैं। इसलिए, हालाँकि ब्राह्मणों ने भगवान रामचंद्र के उपहार को मना नहीं किया, लेकिन इसे स्वीकार करने के बाद उन्होंने इसे राजा को वापस कर दिया। भगवान रामचंद्र के उनके प्रति स्नेह से ब्राह्मण इतने प्रसन्न हुए कि उनके हृदय पिघल गए। उन्होंने देखा कि भगवान रामचंद्र, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के अलावा, एक क्षत्रिय के रूप में पूरी तरह से योग्य थे और चरित्र में अनुकरणीय थे। क्षत्रिय के गुणों में से एक दानशील होना है। एक क्षत्रिय, या शासक, नागरिकों पर कर नहीं लगाता है अपने व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए बल्कि उपयुक्त मामलों में दान करने के लिए। दानम ईश्वर-भाव:। एक ओर, क्षत्रियों में शासन करने की प्रवृत्ति होती है, लेकिन दूसरी ओर वे दान के साथ बहुत उदार होते हैं। जब महाराज युधिष्ठिर ने दान दिया, तो उन्होंने दान को वितरित करने का प्रभारी कर्ण को लगाया। दातृ कर्ण के रूप में कर्ण बहुत प्रसिद्ध थे। दातृ शब्द उस व्यक्ति को संदर्भित करता है जो बहुत उदारता से दान देता है। राजा हमेशा बड़ी मात्रा में खाद्यान्न रखते थे, और जब भी अनाज की कमी होती थी, तो वे दान में अनाज बांटते थे। क्षत्रिय का कर्तव्य दान देना है, और ब्राह्मण का कर्म दान स्वीकार करना है, पर शरीर और आत्मा को एक साथ बनाए रखने के लिए जितनी आवश्यकता हो उससे अधिक नहीं। इसलिए, जब भगवान रामचंद्र द्वारा ब्राह्मणों को इतनी भूमि दी गई, तो उन्होंने उसे उन्हें लौटा दिया और लालची नहीं रहे।
