श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 10: परम भगवान् रामचन्द्र की लीलाएँ  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  9.10.55 
प्रेम्णानुवृत्त्या शीलेन प्रश्रयावनता सती ।
भिया ह्रिया च भावज्ञा भर्तु: सीताहरन्मन: ॥ ५५ ॥
 
 
अनुवाद
सीतादेवी अत्यन्त विनीत, आज्ञाकारी, लज्जालु और सती स्त्री थीं और सदा अपने पति के मन की भावनाओं को समझने वाली थीं। इस प्रकार अपने अच्छे चरित्र, प्रेम और सेवा से वे भगवान् के मन को पूरी तरह से अपनी ओर आकर्षित कर सकीं।
 
Sita Devi was very humble, obedient, modest and chaste and always understood her husband's feelings. Thus, by her character and love and service, she was able to completely captivate the mind of the Lord.
तात्पर्य
जैसे भगवान रामचन्द्र आदर्श पति (एक-पत्नी-व्रत) हैं, माता सीता आदर्श पत्नी हैं। इस तरह के संयोग से पारिवारिक जीवन बहुत सुखी होता है। यद् यद् आचरति श्रेष्ठं तत् तद एव एतरो जनः: श्रेष्ठ व्यक्ति जो भी आदर्श स्थापित करता है, साधारण जन उसका अनुसरण करते हैं। यदि राजा, नेता, ब्राह्मण और आचार्य वैदिक साहित्य से मिलने वाले उदाहरण स्थापित करेंगे तो संपूर्ण संसार स्वर्ग हो जाएगा; वास्तव में, इस भौतिक संसार के भीतर नारकीय परिस्थितियाँ समाप्त हो जाएँगी।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध नौ के अंतर्गत दसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)