| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 9: मुक्ति » अध्याय 10: परम भगवान् रामचन्द्र की लीलाएँ » श्लोक 26 |
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| | | | श्लोक 9.10.26  | हा हता: स्म वयं नाथ लोकरावण रावण ।
कं यायाच्छरणं लङ्का त्वद्विहीना परार्दिता ॥ २६ ॥ | | | | | | अनुवाद | | हे नाथ, हे स्वामी! तुम दूसरों के लिए कष्ट के प्रतीक थे, इसलिए तुम रावण कहलाए। पर अब जब तुम पराजित हो गए हो, तो हम भी पराजित हैं क्योंकि तुम्हारे बिना लंका के राज्य को शत्रुओं ने जीत लिया है। बताओ, अब लंका किसकी शरण में जाएगी? | | | | हे नाथ, हे स्वामी! तुम दूसरों के लिए कष्ट के प्रतीक थे, इसलिए तुम रावण कहलाए। पर अब जब तुम पराजित हो गए हो, तो हम भी पराजित हैं क्योंकि तुम्हारे बिना लंका के राज्य को शत्रुओं ने जीत लिया है। बताओ, अब लंका किसकी शरण में जाएगी? | | ✨ ai-generated | | |
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