देवलिङ्गप्रतिच्छन्न: स्वर्भानुर्देवसंसदि ।
प्रविष्ट: सोममपिबच्चन्द्रार्काभ्यां च सूचित: ॥ २४ ॥
अनुवाद
सूर्य तथा चंद्रमा को ग्रहण लगाने वाला राक्षस राहु देवताओं के वस्त्र पहनकर देवताओं की सभा में घुस गया और किसी को भी पता नहीं चला, यहाँ तक के भगवान् को भी नहीं। लेकिन चंद्रमा और सूर्य, राक्षस राहु से स्थायी शत्रुता रखते थे, इसलिए उन्हें स्थिति का पता लग गया। इस तरह राहु का असली रूप सबके सामने आ गया।
Rahu, the demon who engulfed the Sun and the Moon, covered himself with the clothes of a god and entered the company of the gods and began drinking the nectar without anyone, not even the Lord, knowing. But the Sun and the Moon, due to their eternal enmity with Rahu, sensed the situation. Thus Rahu was identified.
तात्पर्य
परमेश्वर के पूर्ण मानवीय स्वरूप, मोहिनी-मूर्ति, सभी राक्षसों को चकमा देने में सफल रहे, किन्तु राहु अत्यंत चतुर था कि वह चकमा नहीं खाया। राहु समझ सकता था कि मोहिनी-मूर्ति राक्षसों के साथ छल कर रहा था, इसलिये, उसने अपने कपड़े बदले, स्वयं को देवता के वेश में प्रच्छन्न किया और देवताओं की सभा में जाकर बैठ गया। यहां कोई पूछ सकता है कि परमेश्वर के पूर्ण मानवीय स्वरूप राहु की पहचान कैसे नहीं कर पाये। कारण यह है कि प्रभु अमृतपान के प्रभाव को दर्शाना चाहते थे। इसे आगामी श्लोकों में देखा जा सकता है। चंद्रमा और सूर्य, यद्यपि, राहु के सम्बन्ध में सदा चौकस रहे। अतः जब राहु देवताओं की सभा में प्रविष्ट हुआ, तो चंद्रमा और सूर्य शीघ्र ही उसे पहचान गये, तब परमेश्वर के पूर्ण मानवीय स्वरूप को भी उसकी पहचान हो गयी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥