श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 9: मोहिनी-मूर्ति के रूप में भगवान् का अवतार  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  8.9.21 
दैत्यान्गृहीतकलसो वञ्चयन्नुपसञ्चरै: ।
दूरस्थान् पाययामास जरामृत्युहरां सुधाम् ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
अमृत का कलश अपने हाथों में लेकर वह सर्वप्रथम असुरों के पास गई और अपनी मीठी बातों से उन्हें खुश करके उनके अमृत के हिस्से से उन्हें वंचित कर दिया। फिर उसने दूर बैठे हुए देवताओं को अमृत पिलाया ताकि वे बीमारी, बुढ़ापे और मौत से मुक्त हो सकें।
 
With a pot of nectar in her hands she first approached the demons and satisfied them with her sweet voice and thus deprived them of their share of the nectar. Then she gave the nectar to the gods sitting at a distance so that they could be free from weakness, old age and death.
तात्पर्य
मोहिनी-मूर्ति, ईश्वर के व्यक्तित्व ने देवताओं को कुछ दूर पर आसन दिया। फिर उन्होंने दानवों से संपर्क किया और उनसे बहुत कृपा पूर्वक बात की जिससे वे स्वयं को उनसे बात करने के लिए भाग्यशाली समझते थे। चूंकि मोहिनी-मूर्ति ने देवताओं को कुछ दूर पर बैठा दिया था, दानवों को लगा कि देवताओं को अमृत का केवल थोड़ा हिस्सा ही मिलेगा और मोहिनी-मूर्ति दानवों से इतनी प्रसन्न हैं कि वह उन्हें सारा अमृत दे देंगी। वाञ्चयन् उपसंचारैः शब्द दर्शाते हैं कि ईश्वर की पूरी नीति केवल मीठे शब्दों को बोलकर दानवों को धोखा देना थी। ईश्वर का इरादा केवल देवताओं को अमृत वितरित करना था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)