स त्वं नो दर्शयात्मानमस्मत्करणगोचरम् ।
प्रपन्नानां दिदृक्षूणां सस्मितं ते मुखाम्बुजम् ॥ ४५ ॥
अनुवाद
हे भगवान, हम आपके चरणों में समर्पित हैं, फिर भी हम आपको देखना चाहते हैं। कृपा करके अपने मूल रूप और मुस्कुराते हुए कमल के चेहरे को हमारी आँखों को दिखाएँ और हमारी अन्य इंद्रियों द्वारा अनुभव करने दें।
O Lord! We have surrendered to you, yet we want to see you. Please show your original form and your smiling face to our eyes and let us experience it through our other senses.
तात्पर्य
भक्त ईश्वर का अपने मूलाकृति में दर्शन करने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं और उनका कमल-मुख मुस्कुरा रहा हो। वे ईश्वर के निराकार रूप का अनुभव करने में रुचि नहीं रखते हैं। भगवान के स्वरूप वैयक्तिक और अवैयक्तिक दोनों हैं। अवैयक्तिकवादी भगवान के वैयक्तिक स्वरूप के बारे में कुछ नहीं जानते हैं, लेकिन भगवान ब्रह्मा और उनके शिष्य वर्ग के लोग उन्हें उनके वैयक्तिक रूप में देखना चाहते हैं। वैयक्तिक रूप के बिना मुस्कुराते हुए चेहरे का प्रश्न नहीं उठता, जैसा कि यहाँ स्पष्ट रूप से शसितम ते मुख्ंबुजम शब्दों से संकेत किया गया है। जो लोग ब्रह्मा के वैष्णव सम्प्रदाय में हैं, वे हमेशा भगवान के वैयक्तिक रूप को देखना चाहते हैं। वे भगवान के वैयक्तिक रूप को साकार करने के लिए उत्सुक हैं, न कि अवैयक्तिक रूप को। जैसा कि यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है, अस्मद्-करण-गोचरम: भगवान का वैयक्तिक रूप सीधे हमारी इंद्रियों द्वारा देखा जा सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥