श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 5: देवताओं द्वारा भगवान् से सुरक्षा याचना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  8.5.24 
श्रीशुक उवाच
इत्याभाष्य सुरान्वेधा: सह देवैररिन्दम ।
अजितस्य पदं साक्षाज्जगाम तमस: परम् ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
हे समस्त शत्रुओं के नाश करने वाले महाराज परीक्षित! भगवान ब्रह्मा के देवताओं से वार्तालाप के समापन के पश्चात्, वे उन्हें अपने साथ भगवान विष्णु के धाम में ले गए जो इस भौतिक जगत से परे है। भगवान विष्णु का धाम क्षीर सागर में स्थित श्वेतद्वीप नामक द्वीप में है।
 
O King Parikshit, the destroyer of all enemies! After talking to the demigods, Lord Brahma took them to the abode of the Lord which is beyond this material world. The abode of the Lord is on the island called Svetadvipa, which is situated in the Ksheera Sagar.
तात्पर्य
महाराजा परीक्षित को यहाँ अरिंदम, "सभी शत्रुओं का दमन करने वाला" कहा गया है। हमारे शरीर के बाहर ही नहीं हमारे शरीर में भी कई शत्रु होते हैं, जैसे कामुक इच्छाएँ, क्रोध और लालच। महाराजा परीक्षित को विशेष रूप से अरिंदम के रूप में संबोधित किया जाता है क्योंकि अपने राजनीतिक जीवन में वह सभी प्रकार के शत्रुओं को वश में करने में सक्षम थे, और यद्यपि वह एक युवा राजा थे, जैसे ही उन्होंने सुना कि वह सात दिनों के भीतर मरने वाले हैं, उन्होंने तुरंत अपना राज्य छोड़ दिया। उन्होंने अपने शरीर के भीतर के शत्रुओं, जैसे वासना, लालच और क्रोध के आदेशों का पालन नहीं किया। वह मुनि के पुत्र से बिल्कुल भी नाराज़ नहीं थे जिसने उन्हें शाप दिया था। बल्कि, उन्होंने शाप को स्वीकार किया और शुकादेव गोस्वामी के संग में अपनी मृत्यु के लिए तैयार हो गए। मृत्यु अनिवार्य है; कोई भी मृत्यु की शक्ति को पार नहीं कर सकता। इसलिए महाराजा परीक्षित, जब पूरी तरह से जीवित थे, श्रीमद् भागवतम् सुनना चाहते थे। परिणामस्वरूप उन्हें यहाँ अरिंदम के रूप में संबोधित किया जाता है। एक और शब्द, सुर-प्रिय, भी महत्वपूर्ण है। यद्यपि कृष्ण, ईश्वर का सर्वोच्च व्यक्तित्व, सभी के प्रति समान हैं, लेकिन वे अपने भक्तों के प्रति विशेष रूप से इच्छुक हैं (ये भजन्ति तु माँ भक्त्या मयि ते तेशु चैप्य अहम्)। भक्त सभी देवता हैं। इस दुनिया में दो प्रकार के लोग हैं। एक को देव कहा जाता है, और दूसरे को असुर कहा जाता है। पद्म पुराण कहता है:

द्वौ भूत-सर्गौ लोकेऽस्मिन्

दैव आसुर एव च

विष्णु-भक्तः स्मृतो दैव

आसुरस्तद-विपर्ययः

जो कोई भी भगवान कृष्ण का भक्त है उसे देव कहा जाता है, और अन्य, भले ही वे देवताओं के भक्त हो सकते हैं, असुर कहलाते हैं। उदाहरण के लिए, रावण भगवान शिव का महान भक्त था, लेकिन उसे असुर के रूप में वर्णित किया गया है। इसी तरह, हिरण्यकशिपु को भगवान ब्रह्मा का एक महान भक्त बताया गया है, फिर भी वह भी एक असुर था। इसलिए विष्णु भगवान का भक्त ही सुर कहलाता है, असुर नहीं। भगवान कृष्ण अपने भक्तों से बहुत प्रसन्न होते हैं, भले ही वे भक्ति सेवा के सर्वोच्च मंच पर न हों। भक्ति सेवा के निचले पायदान पर भी व्यक्ति पारलौकिक होता है, और यदि व्यक्ति भक्ति जीवन के साथ जारी रहता है, तो वह देव या सुर बना रहता है। यदि कोई इस तरह से जारी रहता है, तो कृष्ण हमेशा उससे प्रसन्न रहेंगे और उसे सभी निर्देश देंगे ताकि वह बहुत आसानी से घर लौट सके, भगवान के पास वापस जा सके। अजीतस्य पदम के संबंध में, इस भौतिक दुनिया के क्षीर सागर में भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का निवास है, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं: पदं क्षीरोधधि-स्था-श्वेतद्वीपं तमसः प्रकृतेः परम्। श्वेतद्वीप नामक द्वीप, जो क्षीर सागर में है, पारलौकिक है। इसका इस भौतिक दुनिया से कोई लेना-देना नहीं है। नगर निगम का एक विश्राम गृह हो सकता है जहां गवर्नर और महत्वपूर्ण सरकारी अधिकारी रहते हैं। ऐसा विश्राम गृह कोई साधारण घर नहीं होता है। इसी तरह, यद्यपि श्वेतद्वीप, जो क्षीर सागर में है, इस भौतिक दुनिया में है, यह परं पदम है, पारलौकिक है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)