द्वौ भूत-सर्गौ लोकेऽस्मिन्
दैव आसुर एव च
विष्णु-भक्तः स्मृतो दैव
आसुरस्तद-विपर्ययः
जो कोई भी भगवान कृष्ण का भक्त है उसे देव कहा जाता है, और अन्य, भले ही वे देवताओं के भक्त हो सकते हैं, असुर कहलाते हैं। उदाहरण के लिए, रावण भगवान शिव का महान भक्त था, लेकिन उसे असुर के रूप में वर्णित किया गया है। इसी तरह, हिरण्यकशिपु को भगवान ब्रह्मा का एक महान भक्त बताया गया है, फिर भी वह भी एक असुर था। इसलिए विष्णु भगवान का भक्त ही सुर कहलाता है, असुर नहीं। भगवान कृष्ण अपने भक्तों से बहुत प्रसन्न होते हैं, भले ही वे भक्ति सेवा के सर्वोच्च मंच पर न हों। भक्ति सेवा के निचले पायदान पर भी व्यक्ति पारलौकिक होता है, और यदि व्यक्ति भक्ति जीवन के साथ जारी रहता है, तो वह देव या सुर बना रहता है। यदि कोई इस तरह से जारी रहता है, तो कृष्ण हमेशा उससे प्रसन्न रहेंगे और उसे सभी निर्देश देंगे ताकि वह बहुत आसानी से घर लौट सके, भगवान के पास वापस जा सके। अजीतस्य पदम के संबंध में, इस भौतिक दुनिया के क्षीर सागर में भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का निवास है, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं: पदं क्षीरोधधि-स्था-श्वेतद्वीपं तमसः प्रकृतेः परम्। श्वेतद्वीप नामक द्वीप, जो क्षीर सागर में है, पारलौकिक है। इसका इस भौतिक दुनिया से कोई लेना-देना नहीं है। नगर निगम का एक विश्राम गृह हो सकता है जहां गवर्नर और महत्वपूर्ण सरकारी अधिकारी रहते हैं। ऐसा विश्राम गृह कोई साधारण घर नहीं होता है। इसी तरह, यद्यपि श्वेतद्वीप, जो क्षीर सागर में है, इस भौतिक दुनिया में है, यह परं पदम है, पारलौकिक है।
