पाप कर्मों के कारण, रात में हम बुरे सपने देखते हैं, जो बहुत तकलीफदेह होते हैं। दरअसल, महाराज युधिष्ठिर को प्रभु की भक्ति सेवा से थोड़ा विचलित होने के कारण नरक देखने पर मजबूर होना पड़ा था। इसलिए, दु:स्वप्न - बुरे सपने - पाप कर्मों के कारण आते हैं। एक भक्त कभी-कभी एक पापी व्यक्ति को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करता है, और शिष्य से स्वीकार की गई पाप प्रतिक्रियाओं का प्रतिकार करने के लिए, उसे एक बुरा सपना देखना पड़ता है। फिर भी, आध्यात्मिक गुरु इतने दयालु होते हैं कि काली-युग के पीड़ितों के उद्धार के लिए पापी शिष्य के कारण बुरे सपने आने के बावजूद, वह इस परेशानी वाले व्यवसाय को स्वीकार करते हैं। इसलिए, दीक्षा के बाद, एक शिष्य को बहुत सावधान रहना चाहिए कि वह फिर से कोई पाप कर्म न करे जिससे खुद को और आध्यात्मिक गुरु को परेशानी हो। देवता के सामने, अग्नि के सामने, आध्यात्मिक गुरु के सामने और वैष्णवों के सामने, ईमानदार शिष्य सभी पापी गतिविधियों से दूर रहने का वादा करता है। इसलिए उसे फिर से पाप कर्म नहीं करना चाहिए और इस तरह एक परेशानी वाली स्थिति पैदा नहीं करनी चाहिए।
