श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 4: गजेन्द्र का वैकुण्ठ गमन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  8.4.15 
यथानुकीर्तयन्त्येतच्छ्रेयस्कामा द्विजातय: ।
शुचय: प्रातरुत्थाय दु:स्वप्नाद्युपशान्तये ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए, जो लोग अपना कल्याण चाहते हैं - विशेष रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य और इनमें से भी मुख्य रूप से ब्राह्मण वैष्णव - उन्हें सुबह बिस्तर से उठकर बुरे सपनों के दुखों को दूर करने के लिए इस कथा को बिना विचलित हुए उसी तरह पढ़ना चाहिए ।
 
Therefore those who seek their own welfare - particularly the Brahmins, Kshatriyas and Vaishyas, and among these chiefly the Brahmins and Vaishnavas - should get up from bed in the morning and recite this story verbatim without distraction to get rid of the troubles of their nightmares.
तात्पर्य
वैदिक साहित्य में हर छन्द विशेष रूप से श्रीमद-भागवतम और भगवद-गीता में एक वैदिक मंत्र होता है। यहाँ, यथांकित्यन्ति शब्द का प्रयोग यह अनुशंसा करने के लिए किया गया है कि इस साहित्य को वैसा ही प्रस्तुत किया जाए जैसा वह है। हालाँकि, बेईमान व्यक्ति वास्तविक वर्णन से विचलित होते हैं और व्याकरणिक हथकंडे से अपने तरीके से पाठ की व्याख्या करते हैं। इस तरह के विचलन से बचना चाहिए। यह एक वैदिक निषेधाज्ञा है जिसका समर्थन महाजनों या अधिकारियों में से एक शुकादेव गोस्वामी करते हैं। वह कहते हैं, यथांकित्यन्ति: व्यक्ति को मंत्र का ज्यों का त्यों पाठ करना चाहिए, बिना विचलन के, क्योंकि तब वह सारे सौभाग्य के मंच पर चढ़ने के योग्य होगा। शुकादेव गोस्वामी विशेष रूप से यह अनुशंसा करते हैं कि जो ब्राह्मण (शुचयं) हैं, वे सभी मंत्रों का पाठ सुबह उठकर करें।

पाप कर्मों के कारण, रात में हम बुरे सपने देखते हैं, जो बहुत तकलीफदेह होते हैं। दरअसल, महाराज युधिष्ठिर को प्रभु की भक्ति सेवा से थोड़ा विचलित होने के कारण नरक देखने पर मजबूर होना पड़ा था। इसलिए, दु:स्वप्न - बुरे सपने - पाप कर्मों के कारण आते हैं। एक भक्त कभी-कभी एक पापी व्यक्ति को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करता है, और शिष्य से स्वीकार की गई पाप प्रतिक्रियाओं का प्रतिकार करने के लिए, उसे एक बुरा सपना देखना पड़ता है। फिर भी, आध्यात्मिक गुरु इतने दयालु होते हैं कि काली-युग के पीड़ितों के उद्धार के लिए पापी शिष्य के कारण बुरे सपने आने के बावजूद, वह इस परेशानी वाले व्यवसाय को स्वीकार करते हैं। इसलिए, दीक्षा के बाद, एक शिष्य को बहुत सावधान रहना चाहिए कि वह फिर से कोई पाप कर्म न करे जिससे खुद को और आध्यात्मिक गुरु को परेशानी हो। देवता के सामने, अग्नि के सामने, आध्यात्मिक गुरु के सामने और वैष्णवों के सामने, ईमानदार शिष्य सभी पापी गतिविधियों से दूर रहने का वादा करता है। इसलिए उसे फिर से पाप कर्म नहीं करना चाहिए और इस तरह एक परेशानी वाली स्थिति पैदा नहीं करनी चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)