मदीयं महिमानं च परं ब्रह्मेति शब्दितम् ।
वेत्स्यस्यनुगृहीतं मे सम्प्रश्नैर्विवृतं हृदि ॥ ३८ ॥
अनुवाद
मैं तुम्हें उचित सलाह दूँगा और तुम्हारा पक्ष भी लूँगा। मेरे परब्रह्म की महिमाओं के बारे में तुम्हारी जिज्ञासाओं के कारण तुम्हारे हृदय में हर बात प्रकट हो जाएगी। इस प्रकार तुम मेरे बारे में सब कुछ जान जाओगे।
I will advise you properly and take your side and everything will be revealed to you within your heart due to your curiosity about the glories of Me, the Supreme Being. In this way you will know everything about Me.
तात्पर्य
जैसा भगवद्-गीता (15.15) में कहा गया है, सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर् ज्ञानम् अपोहनं च: ईश्वर का परम व्यक्तित्व, परमात्मा, हर किसी के हृदय में स्थित है, और उसी से स्मरण, ज्ञान और विस्मरण आता है। भगवान अपने प्रति आपके समर्पण के अनुपात में स्वयं को प्रकट करते हैं। ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्य अहम्। उत्तरदायी सहयोग में, भगवान स्वयं को व्यक्ति के आत्मसमर्पण के अनुपात में प्रकट करते हैं। वह जो पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण करने वाले को प्रकट किया जाता है वह उससे अलग होता है जो आंशिक रूप से समर्पण करता है। हर कोई स्वाभाविक रूप से ईश्वर के परम व्यक्तित्व के सामने समर्पण करता है, या तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से। बद्ध आत्मा भौतिक अस्तित्व में प्रकृति के नियमों के सामने समर्पण करता है, लेकिन जब कोई भगवान के सामने पूर्ण रूप से समर्पण करता है, तो भौतिक प्रकृति उस पर कार्य नहीं करती है। ऐसी पूर्ण रूप से समर्पित आत्मा को ईश्वर का परम व्यक्तित्व सीधे तौर पर तरजीह देता है। मामेवे ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते। वह जो भगवान के सामने पूर्ण रूप से समर्पण कर चुका है, उसे भौतिक प्रकृति के तरीकों का कोई डर नहीं है, क्योंकि सब कुछ भगवान की महिमा का विस्तार है (सर्वं खल्विदं ब्रह्म), और ये महिमा धीरे-धीरे प्रकट और महसूस किए जाते हैं। भगवान सर्वोच्च शुद्धिकर्ता हैं (परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान)। जितना अधिक कोई शुद्ध होता है और वह सर्वोच्च के बारे में उतना ही अधिक जानना चाहता है, भगवान उसे उतना ही अधिक प्रकट करते हैं। ब्रह्म के बारे में पूर्ण ज्ञान, परमात्मा और भगवान शुद्ध भक्तों को प्रकट किया जाता है। भगवान भगवद्-गीता (10.11) में कहते हैं:
तेषामेवानुग्रहार्थम
अहं ज्ञानजं तमः
नाशयाम्यत्मभावस्थो
ज्ञानदीपेन भास्वता
"उनके प्रति करुणा में, मैं, उनके हृदय में निवास करते हुए, ज्ञान के दीप्त दीपक के साथ अज्ञानता से पैदा हुए अंधेरे को नष्ट करता हूँ।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥