श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 24: भगवान् का मत्स्यावतार  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  8.24.30 
न तेऽरविन्दाक्ष पदोपसर्पणं
मृषा भवेत् सर्वसुहृत्प्रियात्मन: ।
यथेतरेषां पृथगात्मनां सता-
मदीद‍ृशो यद् वपुरद्भ‍ुतं हि न: ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
हे कमल दल समान नेत्रों वाले प्रभु! देह के भौतिक गुणों की पहचान से युक्त देवताओं की पूजा सभी तरह से निरर्थक है। चूँकि आप हर एक के परम मित्र तथा प्रियतम परमात्मा हैं, इसलिए आपके चरणकमलों की पूजा कभी व्यर्थ नहीं जाती। इसलिए आपने मछली का रूप प्रकट किया है।
 
O Lord with eyes like lotus petals! Worship of gods who consider themselves as embodied souls is futile in every way. Since you are the best friend and the beloved of everyone, therefore the worship of your feet never goes in vain. That is why you have taken the form of a fish.
तात्पर्य
इंद्र, चंद्र और सूर्य जैसे देवता सामान्य जीवित प्राणी हैं, जो ईश्वर के भिन्न रूप से विभाजित होते हैं। भगवान अपने आप को जीवित प्राणियों (नित्यो नित्यानां चेतनश् चेतनानां (कठ उपनिषद 2.2.13) के माध्यम से विस्तारित करते हैं। उनके निजी विष्णु-तत्व रूप, जो सभी आध्यात्मिक हैं, स्वांश कहलाते हैं और जो जीवित प्राणी विभाजित रूप हैं, वह विभिन्नांश कहलाते हैं। विभिन्नांश रूपों में से कुछ आध्यात्मिक हैं और कुछ पदार्थ और आत्मा का मिश्रण होते हैं। भौतिक दुनिया में बंधी हुई आत्माएँ भौतिक ऊर्जा से बनी अपनी बाहरी निकायों से अलग होती हैं। इस प्रकार, ऊपरी ग्रहों प्रणालियों में रहने वाले देवता और निचले ग्रहों प्रणाली में रहने वाले जीवित प्राणी एक ही प्रकृति के हैं। फिर भी, इस ग्रह पर मनुष्य के रूप में रहने वाले कभी-कभी ऊपरी ग्रहों प्रणालियों के देवताओं की पूजा करने के लिए आकर्षित होते हैं। ऐसी पूजा अस्थायी है। जैसे इस ग्रह पर मनुष्य को अपने शरीर को बदलना पड़ता है (तथा देहंतरप्राप्तिः), इंद्र, चंद्र, वरुण आदि नामक जीवित प्राणियों को भी समय के साथ अपने शरीर को बदलना होगा। जैसा कि भगवद-गीता में कहा गया है: "अंशवंत तु फलं तेषां तद् भवत्यल्प मेधसाम: " "छोटी बुद्धि के पुरुष देवताओं की पूजा करते हैं और उनके फल सीमित और अस्थायी होते हैं।" कामैस तεις तैर ह्रत ज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्य देवताः: जो देवताओं की स्थिति को नहीं जानते हैं, वे किसी भौतिक उद्देश्य के लिए देवताओं की पूजा करने के लिए इच्छुक होते हैं, लेकिन ऐसी पूजा के परिणाम कभी भी स्थायी नहीं होते हैं। नतीजतन, यहाँ यह कहा गया है, यथेतरेषाम पृथक्-आत्मानम सताम, पदोपसर्पणं मृषा भवेट। दूसरे शब्दों में, यदि किसी को किसी और की पूजा करनी है, तो उसे भगवान की पूजा करनी चाहिए। तब उनकी पूजा कभी भी निष्फल नहीं होगी। स्वल्पम अपि अस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात: भगवान की पूजा करने का थोड़ा सा भी प्रयास भी एक स्थायी संपत्ति है। इसलिए, श्रीमद-भागवतम में अनुशंसित है, त्याक्त्वा स्व-धर्मं चरणांबुजं हरहे। किसी को भी हरि के चरणों की पूजा करनी चाहिए, भले ही इसका मतलब किसी विशेष शरीर के कारण असाइन की गई तथाकथित व्यावसायिक ड्यूटी को छोड़ना हो। क्योंकि शरीर के संदर्भ में पूजा अस्थायी है, यह कोई स्थायी फल नहीं देती है। लेकिन भगवान की पूजा से बहुत लाभ मिलता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)