ब्रह्मा जी और सभी लोक के प्रमुख देवता अपने उस परम स्वामी भगवान वामनदेव की पूजा करने लगे, जिन्होंने अपने सर्वत्र-व्यापक रूप को छोटा करके अपना मूल रूप धारण किया था। उन्होंने पूजा की सारी सामग्रियाँ एकत्रित कीं।
Brahmaji and all the chief deities of various worlds started worshipping their supreme lord Lord Vamandev who had reduced his omnipresent form and assumed his original form. They collected all the materials for worship.
तात्पर्य
वामनदेव ने सर्वप्रथम विराट स्वरूप धारण किया और तत्पश्चात अपने मूल वामन-रूप में आ गये। इस प्रकार उन्होंने बिल्कुल भगवान कृष्ण की तरह ही कार्य किया, जिन्होंने अर्जुन के आग्रह पर पहले अपना विराट रूप दिखाया और बाद में कृष्ण रूप में अपने मूल स्वरूप को प्राप्त किया। भगवान अपना मनचाहा कोई भी रूप धारण कर सकते हैं, पर उनका मूल रूप कृष्ण (कृष्णस तु भगवान स्वयं) का है। भक्त की क्षमता के अनुसार, भगवान अलग-अलग रूप धारण करते हैं ताकि भक्त उन्हें संभाल सकें। यह उनकी निःस्वार्थ दया है। जब भगवान वामनदेव अपने मूल रूप में आ गये, भगवान ब्रह्मा और उनके साथियों ने उनकी पूजा के लिए विविध सामग्री एकत्र की ताकि उन्हें प्रसन्न किया जा सके।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥