बालस्य नेह शरणं पितरौ नृसिंह
नार्तस्य चागदमुदानवति मज्जतो नौः
तप्तास्य तत् प्रतिविधिर्य इहांजशेष्ठस्
तावद् विभी तनुभृतां त्वदुपेक्षित
हम इस भौतिक दुनिया के खतरों के विरुद्ध खुश रहने या उनका मुकाबला करने के लिए कई तरीके ईजाद कर सकते हैं, लेकिन जब तक हमारे प्रयासों को भगवान श्री कृष्ण सर्वोच्च अनुमोदित नहीं करते, वे हमें कभी खुश नहीं करेंगे। जो लोग भगवान श्री कृष्ण की शरण लिए बिना खुश रहने की कोशिश करते हैं वे मूढ़, रस्कल हैं। न माम दुः कृतिनो मूढ़ाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। जो लोग मनुष्यों में सबसे निचले हैं वे कृष्ण भावना को स्वीकार करने से इनकार करते हैं क्योंकि वे सोचते हैं कि वे बिना कृष्ण की देखभाल के खुद की सुरक्षा करने में सक्षम होंगे। यह उनकी गलती है। हाथियों के राजा गजेंद्र का निर्णय सही था। ऐसी खतरनाक स्थिति में, उन्होंने भगवान श्री कृष्ण की शरण मांगी।
