श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 2: गजेन्द्र का संकट  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  8.2.32 
न मामिमे ज्ञातय आतुरं गजा:
कुत: करिण्य: प्रभवन्ति मोचितुम् ।
ग्राहेण पाशेन विधातुरावृतो-
ऽप्यहं च तं यामि परं परायणम् ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
जब मेरे साथी हाथी और अन्य संबंधी मुझे इस संकट से नहीं बचा सके तो मेरी पत्नियों का तो क्या कहना? वे कुछ नहीं कर सकतीं। यह भाग्य की इच्छा थी कि इस मगरमच्छ ने मुझ पर हमला किया है, इसलिए मैं उस परमेश्वर की शरण में जाता हूँ जो हमेशा हर किसी को, यहाँ तक कि महान व्यक्तियों को भी, शरण देता है।
 
When my friends and other related elephants could not rescue me from this danger, what to say about my wives? They cannot do anything. It was divine will that this crocodile has attacked me, therefore I seek refuge in the Lord who always provides refuge to everyone, even to great men.
तात्पर्य
इस भौतिक जगत् को पदं पदं यद् विपदां के रूप में वर्णित किया गया है, जिसका अर्थ है कि प्रत्येक कदम पर खतरा है। एक मूर्ख गलती से यह सोचता है कि वह इस भौतिक दुनिया में खुश है, लेकिन वास्तव में वह ऐसा नहीं है, क्योंकि जो इस तरह सोचता है वह केवल भ्रमित है। हर कदम पर, हर पल खतरा है। आधुनिक सभ्यता में एक व्यक्ति सोचता है कि यदि उसके पास एक अच्छा घर और एक अच्छी कार है तो उसका जीवन उत्तम है। पश्चिमी देशों में, खासकर अमेरिका में, एक अच्छी कार का होना बहुत अच्छा है, लेकिन जैसे ही कोई सड़क पर होता है, तब खतरा होता है क्योंकि किसी भी क्षण दुर्घटना हो सकती है और व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है। अभिलेख वास्तव में दर्शाते हैं कि ऐसे दुर्घटनाओं में बहुत से लोग मरते हैं। इसलिए यदि हम वास्तव में सोचते हैं कि यह भौतिक दुनिया एक बहुत ही खुशहाल जगह है, तो यह हमारी अज्ञानता है। वास्तविक ज्ञान यह है कि यह भौतिक दुनिया खतरे से भरी हुई है। हम अपने अस्तित्व के लिए उतना ही संघर्ष कर सकते हैं जितना हमारी बुद्धि हमें अनुमति देती है और खुद की देखभाल करने का प्रयास कर सकते हैं, लेकिन जब तक भगवान श्री कृष्ण, अंततः हमें खतरे से नहीं बचाते, हमारे प्रयास बेकार होंगे। इसलिए प्रह्लाद महाराज कहते हैं:

बालस्य नेह शरणं पितरौ नृसिंह

नार्तस्य चागदमुदानवति मज्जतो नौः

तप्तास्य तत् प्रतिविधिर्य इहांजशेष्ठस्

तावद् विभी तनुभृतां त्वदुपेक्षित

हम इस भौतिक दुनिया के खतरों के विरुद्ध खुश रहने या उनका मुकाबला करने के लिए कई तरीके ईजाद कर सकते हैं, लेकिन जब तक हमारे प्रयासों को भगवान श्री कृष्ण सर्वोच्च अनुमोदित नहीं करते, वे हमें कभी खुश नहीं करेंगे। जो लोग भगवान श्री कृष्ण की शरण लिए बिना खुश रहने की कोशिश करते हैं वे मूढ़, रस्कल हैं। न माम दुः कृतिनो मूढ़ाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। जो लोग मनुष्यों में सबसे निचले हैं वे कृष्ण भावना को स्वीकार करने से इनकार करते हैं क्योंकि वे सोचते हैं कि वे बिना कृष्ण की देखभाल के खुद की सुरक्षा करने में सक्षम होंगे। यह उनकी गलती है। हाथियों के राजा गजेंद्र का निर्णय सही था। ऐसी खतरनाक स्थिति में, उन्होंने भगवान श्री कृष्ण की शरण मांगी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)