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श्लोक 8.18.22  |
ते ऋत्विजो यजमान: सदस्या
हतत्विषो वामनतेजसा नृप ।
सूर्य: किलायात्युत वा विभावसु:
सनत्कुमारोऽथ दिदृक्षया क्रतो: ॥ २२ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे राजा! वामनदेव के चमकीले तेज से बलि महाराज और सभा के सभी लोग तेजहीन हो गए। तब वे एक-दूसरे से पूछने लगे कि क्या साक्षात सूर्यदेव, सनत्कुमार या अग्निदेव यज्ञोत्सव को देखने आए हैं? |
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| हे राजा! वामनदेव के चमकीले तेज से बलि महाराज और सभा के सभी लोग तेजहीन हो गए। तब वे एक-दूसरे से पूछने लगे कि क्या साक्षात सूर्यदेव, सनत्कुमार या अग्निदेव यज्ञोत्सव को देखने आए हैं? |
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