श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 16: पयोव्रत पूजा विधि का पालन करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  8.16.4 
अप्यभद्रं न विप्राणां भद्रे लोकेऽधुनागतम् ।
न धर्मस्य न लोकस्य मृत्योश्छन्दानुवर्तिन: ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
हे सज्जन! मुझे विस्मय हो रहा है कि कहीं अधर्म हो तो नहीं गया, ब्राह्मण समूह को कहीं कोई हानि तो नहीं हुई अथवा काल के स्वभाव में पड़ी हुई जनता का कोई अनहोना तो नहीं हो गया?
 
हे सज्जन! मुझे विस्मय हो रहा है कि कहीं अधर्म हो तो नहीं गया, ब्राह्मण समूह को कहीं कोई हानि तो नहीं हुई अथवा काल के स्वभाव में पड़ी हुई जनता का कोई अनहोना तो नहीं हो गया?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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