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श्लोक 8.16.2  |
एकदा कश्यपस्तस्या आश्रमं भगवानगात् ।
निरुत्सवं निरानन्दं समाधेर्विरतश्चिरात् ॥ २ ॥ |
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| अनुवाद |
| तब ध्यान की समाधि से उठन के बाद परम शक्तिशाली कश्यपमुनि कई दिनों के बाद जब घर लौटे तो देखा कि अदिति के आश्रम में न तो हर्ष है, न उल्लास। |
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| तब ध्यान की समाधि से उठन के बाद परम शक्तिशाली कश्यपमुनि कई दिनों के बाद जब घर लौटे तो देखा कि अदिति के आश्रम में न तो हर्ष है, न उल्लास। |
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