श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 1: ब्रह्माण्ड के प्रशासक मनु  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  8.1.7 
विरक्त: कामभोगेषु शतरूपापति: प्रभु: ।
विसृज्य राज्यं तपसे सभार्यो वनमाविशत् ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
शतरूपा के पति स्वायंभुव मनु स्वभाव से इंद्रियभोगों के प्रति बिल्कुल भी आसक्त नहीं थे। इसलिए उन्होंने अपने भोग-विलास वाले राज्य का त्याग कर दिया और पत्नी के साथ वन में जाकर तपस्या करने लगे।
 
शतरूपा के पति स्वायंभुव मनु स्वभाव से इंद्रियभोगों के प्रति बिल्कुल भी आसक्त नहीं थे। इसलिए उन्होंने अपने भोग-विलास वाले राज्य का त्याग कर दिया और पत्नी के साथ वन में जाकर तपस्या करने लगे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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