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श्लोक 8.1.7  |
विरक्त: कामभोगेषु शतरूपापति: प्रभु: ।
विसृज्य राज्यं तपसे सभार्यो वनमाविशत् ॥ ७ ॥ |
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| अनुवाद |
| शतरूपा के पति स्वायंभुव मनु स्वभाव से इंद्रियभोगों के प्रति बिल्कुल भी आसक्त नहीं थे। इसलिए उन्होंने अपने भोग-विलास वाले राज्य का त्याग कर दिया और पत्नी के साथ वन में जाकर तपस्या करने लगे। |
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| शतरूपा के पति स्वायंभुव मनु स्वभाव से इंद्रियभोगों के प्रति बिल्कुल भी आसक्त नहीं थे। इसलिए उन्होंने अपने भोग-विलास वाले राज्य का त्याग कर दिया और पत्नी के साथ वन में जाकर तपस्या करने लगे। |
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