यही हमारे कृष्ण भावना आंदोलन का सार है। हम मानव समाज से यही निवेदन कर रहे हैं कि वे भगवद्गीता के उपदेशक के पद चिह्नों पर चलें। भगवद्गीता यथावत के निर्देशों का पालन करें और आपका जीवन सफल होगा। यही कृष्ण भावना आंदोलन का सारांश है। कृष्ण भावना आंदोलन के संस्थापक सभी को यह शिक्षा दे रहे हैं कि वे भगवान रामचंद्र के पद चिह्नों पर कैसे चलें, भगवान कृष्ण के पद चिह्नों पर कैसे चलें और श्री चैतन्य महाप्रभु के पद चिह्नों पर कैसे चलें। इस भौतिक जगत में, हमें एक राजतंत्र या अच्छी सरकार के लिए एक नेता की आवश्यकता होती है। भगवान श्री रामचंद्र ने अपने व्यावहारिक उदाहरण से दिखाया कि कैसे संपूर्ण मानव समाज के लाभार्थ जीना चाहिए। उन्होंने रावण जैसे राक्षसों से युद्ध किया, उन्होंने अपने पिता के आदेशों का पालन किया और वे माता सीता के निष्ठावान पति बने रहे। इस तरह, एक आदर्श राजा के रूप में भगवान रामचंद्र के कार्य की कोई तुलना नहीं है। वास्तव में, लोग अभी भी राम-राज्य के लिए तरसते हैं, जो भगवान रामचंद्र की तरह संचालित सरकार है। इसी तरह, यद्यपि भगवान कृष्ण भगवान के परम व्यक्तित्व हैं, उन्होंने अपने शिष्य और भक्त अर्जुन को सिखाया कि कैसे एक ऐसा जीवन जिया जाए जिसका अंत घर, भगवान के पास वापस जाने में हो (त्याक्त्वा देहं पुनर् जन्म नैति माम् एति सोऽ अर्जुन)। सभी उपदेश - राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक - भगवद्गीता में मिलते हैं। हमें केवल उनका कड़ाई से पालन करना है। भगवान का परम व्यक्तित्व भी एक शुद्ध भक्त की भूमिका निभाने के लिए भगवान चैतन्य के रूप में आते हैं। इस प्रकार भगवान हमें केवल हमारे जीवन को सफल बनाने के लिए अलग-अलग तरीकों से सिखाते हैं, और स्वायंभुव मनु हमसे उनका पालन करने का अनुरोध करते हैं।
स्वायंभुव मनु मानव जाति के नेता हैं, और उन्होंने मानव समाज के मार्गदर्शन के लिए मनु-संहिता नामक पुस्तक दी है। इसमें वे हमें भगवान के विभिन्न अवतारों में भगवान के परम व्यक्तित्व का पालन करने का निर्देश देते हैं। ये अवतार वैदिक साहित्य में वर्णित किए गए हैं, और जयदेव गोस्वामी ने दस महत्वपूर्ण अवतारों का संक्षेप में वर्णन किया है (केशव धृत-मीन-शरीर जय जगत-ईश हरे, केशव धृत-नर-हरि-रूप जय जगत-ईश हरे, केशव धृत-बुद्ध-शरीर जय जगत-ईश हरे, इत्यादि)। स्वायंभुव मनु हमें भगवान के अवतारों के निर्देशों का पालन करने का निर्देश देते हैं, विशेष रूप से भगवद्गीता यथावत में कृष्ण के निर्देशों का पालन करने का।
श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा निर्देशित भक्ति-मार्ग की सराहना करते हुए, सर्वभौम भट्टाचार्य ने इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु की गतिविधियों को चित्रित किया:
वैराग्य-विद्या-निज-भक्ति-योग-
शिक्षार्थ एकः पुरुषः पुराणः
श्री-कृष्ण-चैतन्य-शरीर-धारी
कृपाम्बुधिर यस तम अहम् प्रपद्ये
"मैं भगवान के परम व्यक्तित्व भगवान श्री कृष्ण की शरण लूं, जो भगवान चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित हुए हैं ताकि हमें वास्तविक ज्ञान, उनकी भक्ति सेवा और कृष्ण भावना को बढ़ावा देने वाले कार्यों से वैराग्य सिखा सकें। वह इसलिए अवतरित हुए हैं क्योंकि वह दिव्य कृपा के सागर हैं। मैं उनके चरण कमलों की शरण लूं।" (चैतन्य-चंद्रोदय-नाटक 6.74) कलियुग में, लोग भगवान के परम व्यक्तित्व के निर्देशों का पालन नहीं कर सकते हैं, और इसलिए भगवान स्वयं श्री कृष्ण चैतन्य की भूमिका लेते हैं ताकि व्यक्तिगत रूप से यह सिखा सकें कि कृष्ण भावना से कैसे जुड़ें। वह सभी से उनका अनुसरण करने और कलियुग की पतित आत्माओं को मुक्त करने के लिए गुरु बनने के लिए कहते हैं।
यारे देख, तारे कह "कृष्ण"-उपदेश
आमार आज्ञाय गुरु हां ता'र' एई देश
"भागवद्गीता और श्रीमद भागवतम् में दिए गए भगवान श्री कृष्ण के आदेशों का पालन करने का सभी को निर्देश दें। इस तरह एक अध्यात्मिक गुरु बनें और इस भूमि पर सभी को मुक्त करने का प्रयास करें।" (चैतन्य चरितामृत, मध्य 7.128) भगवान रामचंद्र, भगवान कृष्ण और भगवान चैतन्य महाप्रभु का सुसंगत उद्देश्य मानव समाज को यह सिखाना है कि भगवान के परम निर्देशों का पालन करके कैसे प्रसन्न रहा जाए।
