यद्यपि भौतिक और आध्यात्मिक ऊर्जा दोनों भगवान के हैं, लेकिन जब तक हम भौतिक ऊर्जा में हैं, तब तक उन्हें समझना असंभव है। और जब हम आध्यात्मिक ऊर्जा के पास आते हैं, तो उन्हें जानना बहुत आसान होता है। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम (1.7.23) में कहा गया है: मायाँ व्युदस्य चित्-शक्त्या कैवल्ये स्थित आत्मनि। यद्यपि बाहरी ऊर्जा भगवान के अंतर्गत आती है, जब कोई बाहरी ऊर्जा (मम माया दुरात्यया) में होता है, तो उसे समझना बहुत कठिन होता है। हालाँकि, जब कोई आध्यात्मिक ऊर्जा में आता है, तो उसे समझ सकता है। इसलिए भगवद-गीता (18.55) में कहा गया है, भक्त्या मामभिजानाति यावान याश्चासमि तत्त्वतः: जो कोई भी परमेश्वर को वास्तविकता में समझना चाहता है उसे भक्ति या कृष्ण चेतना का मार्ग अपनाना होगा। इस भक्ति में विभिन्न गतिविधियाँ शामिल हैं (श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पा-सेवनम/ अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यं आत्म-निवेदनम), और भगवान को समझने के लिए भक्ति सेवा के इस मार्ग को अपनाना होगा। भले ही दुनिया के लोग भगवान को भूल गए हैं और कह सकते हैं कि भगवान मर चुके हैं, यह एक तथ्य नहीं है। जब कोई कृष्ण चेतना आंदोलन को अपनाता है तो वह भगवान को समझ सकता है, और इस प्रकार वह खुश रह सकता है।
