श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 1: ब्रह्माण्ड के प्रशासक मनु  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  8.1.13 
स विश्वकाय: पुरुहूत ईश:
सत्य: स्वयंज्योतिरज: पुराण: ।
धत्तेऽस्य जन्माद्यजयात्मशक्त्या
तां विद्ययोदस्य निरीह आस्ते ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
संपूर्ण ब्रह्मांड परम सत्य भगवान का शरीर है जिनके लाखों नाम और अनंत शक्तियाँ हैं। वे आत्म-उज्ज्वल, जन्म से रहित और अपरिवर्तनीय हैं। वे प्रत्येक वस्तु के आदि हैं, लेकिन स्वयं उनका कोई आदि नहीं है। चूंकि उन्होंने अपनी बाहरी शक्ति से इस विशाल रूप की सृष्टि की है, इसलिए यह उनके द्वारा उत्पन्न, पालन और विनाश होता हुआ प्रतीत होता है। फिर भी, वे अपनी आध्यात्मिक शक्ति में निष्क्रिय रहते हैं और भौतिक शक्ति की गतिविधियाँ उन्हें स्पर्श भी नहीं कर पाती हैं।
 
This entire universe is the body of the Supreme Truth, the Supreme Lord, who has millions of names and infinite potencies. He is self-effulgent, unborn and changeless. He is the beginning of everything, but He Himself has no beginning. Since He has created this vast form by His external energy, it appears to be created, sustained and destroyed by Him. Yet He remains inactive in His spiritual energy and the activities of material energy cannot even touch Him.
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु अपने शिक्षाष्टक में कहते हैं, नामनाम अकारी बहुधा निज-सर्व-शक्ति: परमेश्वर के अनेक नाम हैं, जो परम पुरुष से भिन्न नहीं हैं। यह आध्यात्मिक अस्तित्व है। सर्वोच्च भगवान के नामों से मिलकर बने हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करने पर, हम पाते हैं कि नाम में व्यक्ति की सभी शक्तियाँ निहित हैं। भगवान की गतिविधियाँ अनेक हैं, और अपनी गतिविधियों के अनुसार उनके कई नाम हैं। वह माँ यशोदा के पुत्र के रूप में, और माँ देवकी के पुत्र के रूप में भी प्रकट हुए, और इसलिए उन्हें देवकी-नंदन और यशोदा-नंदन नाम दिया गया है। पराश्य शक्तिर्विवधैव श्रूयते: भगवान के पास ऊर्जाओं की एक भीड़ है, और इसलिए वह बहुविध तरीकों से कार्य करते हैं। फिर भी उनका एक विशिष्ट नाम है। शास्त्रों में सिफारिश की जाती है कि हम किन नामों का जाप करें, जैसे हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे। ऐसा नहीं है कि हमें किसी नाम की तलाश करनी है या एक नाम बनाना है। बल्कि, हमें उनके पवित्र नाम का जाप करने में संत व्यक्तियों और शास्त्रों का अनुसरण करना चाहिए।

यद्यपि भौतिक और आध्यात्मिक ऊर्जा दोनों भगवान के हैं, लेकिन जब तक हम भौतिक ऊर्जा में हैं, तब तक उन्हें समझना असंभव है। और जब हम आध्यात्मिक ऊर्जा के पास आते हैं, तो उन्हें जानना बहुत आसान होता है। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम (1.7.23) में कहा गया है: मायाँ व्युदस्य चित्-शक्त्या कैवल्ये स्थित आत्मनि। यद्यपि बाहरी ऊर्जा भगवान के अंतर्गत आती है, जब कोई बाहरी ऊर्जा (मम माया दुरात्यया) में होता है, तो उसे समझना बहुत कठिन होता है। हालाँकि, जब कोई आध्यात्मिक ऊर्जा में आता है, तो उसे समझ सकता है। इसलिए भगवद-गीता (18.55) में कहा गया है, भक्त्या मामभिजानाति यावान याश्चासमि तत्त्वतः: जो कोई भी परमेश्वर को वास्तविकता में समझना चाहता है उसे भक्ति या कृष्ण चेतना का मार्ग अपनाना होगा। इस भक्ति में विभिन्न गतिविधियाँ शामिल हैं (श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पा-सेवनम/ अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यं आत्म-निवेदनम), और भगवान को समझने के लिए भक्ति सेवा के इस मार्ग को अपनाना होगा। भले ही दुनिया के लोग भगवान को भूल गए हैं और कह सकते हैं कि भगवान मर चुके हैं, यह एक तथ्य नहीं है। जब कोई कृष्ण चेतना आंदोलन को अपनाता है तो वह भगवान को समझ सकता है, और इस प्रकार वह खुश रह सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)