श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 1: ब्रह्माण्ड के प्रशासक मनु  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  8.1.11 
यं पश्यति न पश्यन्तं चक्षुर्यस्य न रिष्यति ।
तं भूतनिलयं देवं सुपर्णमुपधावत ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि परमात्मा संसार के कर्मों को सदा देखते हैं, परन्तु कोई उन्हें नहीं देख पाता। फिर भी यह नहीं सोचना चाहिए कि जब कोई उन्हें नहीं देख पाता, तो वह भी सबको नहीं देखते। उनकी दृष्टि कभी क्षीण नहीं होती। अत: हर प्राणी को परमात्मा की आराधना करनी चाहिए, जो मित्र रूप से जीव के साथ सदैव रहते हैं।
 
Although the Lord is constantly watching the activities of the universe, no one can see Him. Still, no one should think that because no one sees Him, He does not see them. Remember that His power of seeing never diminishes, so everyone should worship the Supreme Lord who is always with every living being as a friend.
तात्पर्य
पाण्डवों की माता श्रीमती कुंतीदेवी ने कृष्ण को प्रणाम करते हुए कहा, अलक्ष्यं सर्व भूतानां अन्तर बहिर अवस्थितम : "हे कृष्ण तुम हर चीज़ के अंदर और बाहर रहते हो, फिर भी मूर्ख दासात्मा तुम्हें नहीं देख पाती।" भगवद् गीता में कहा गया है कि परमेश्वर के व्यक्तित्व को ज्ञान-चक्षु में देखा जा सकता है। जो इन ज्ञान की आँखों को खोलता है वह गुरु होता है। इस प्रकार हम अधोलिखित श्लोक के साथ अपने गुरु को प्रणाम करते हैं:

ओम अज्ञान तिमिरान्धस्य

ज्ञान अंजना शलाकाया

चक्षुरि उन्मिलितं येन

तस्मै श्री गुरवे नमः

"मैं अपने गुरु को सादर प्रणाम करता हूँ जिसने ज्ञान की मशाल से मेरी आँखें खोलीं, जो अज्ञानता के अँधेरे से अंधी हो गई थी।" (गौतमीय तंत्र) गुरु का कार्य शिष्य की ज्ञान की आँखें खोलना होता है। जब शिष्य को अज्ञानता से ज्ञान की तरफ जगाया जाता है, तो वह सर्वोच्च देव व्यक्तित्व को हर जगह देख सकता है क्योंकि भगवान वास्तव में हर जगह रहते हैं। अण्डान्तर-स्थ परमाणु-चयान्तर-स्थम् । भगवान इस ब्रह्मांड में रहते हैं, वह सभी जीवों के हृदय में रहते हैं और वह परमाणु के भीतर भी रहते हैं। क्योंकि हममें पूर्ण ज्ञान नहीं है इसलिए हम ईश्वर को नहीं देख पाते पर थोड़ा विचार करने से हम ईश्वर को हर जगह देख सकते हैं। इसके लिए प्रशिक्षण की ज़रूरत होती है। थोड़ा विचार करने से सबसे नीच व्यक्ति भी भगवान की उपस्थिति को अनुभव कर सकता है। अगर हम विचार करें कि इस विशाल समुद्र का मालिक कौन है, इस विशाल भूमि का मालिक कौन है, आकाश कैसे है, आसमान में अनगिनत लाखों तारे और ग्रह कैसे बने हैं, इस ब्रह्मांड को किसने बनाया और यह किसका है तो हमें यह निष्कर्ष निकलना होगा कि हर चीज़ का मालिक कोई है। जब हम किसी विशेष भूमि का स्वामित्व दावा करते हैं, फिर चाहे वह व्यक्तिगत रूप से हो या हमारे परिवार या देश के लिए हो, हमें यह भी विचार करना चाहिए कि हम मालिक कैसे बने। वह भूमि हमारे जन्म से पहले थी, उसके पहले हम भूमि पर आये। यह हमारी संपत्ति कैसे हो गई? इस प्रकार के विचार से हमें यह समझने में मदद मिलेगी कि हर चीज़ का सर्वोच्च मालिक होता है-भगवान का व्यक्तित्व।

सर्वोच्च देव हमेशा जागता रहते हैं। दास अवस्था में हम चीज़ों को भूल जाते हैं क्योंकि हम अपने शरीर बदल लेते हैं पर क्योंकि सर्वोच्च देव व्यक्तित्व अपने शरीर नहीं बदलते हैं, वह अतीत, वर्तमान और भविष्य को याद करते हैं। श्री कृष्ण भगवद् गीता में कहते हैं (4.1), " इमं विवस्वते योगम् प्रोक्तवान अहम् अव्ययम्:" "मैंने सूर्य देव को यह ईश्वर की विज्ञान-भगवद् गीता का ज्ञान कम से कम 4 करोड़ साल पहले दिया था।" जब अर्जुन ने कृष्ण से पूछा कि उन्हें इतनी पुरानी घटनाएँ कैसे याद हैं तो भगवान ने जवाब दिया कि अर्जुन भी उस समय मौजूद थे। क्योंकि अर्जुन कृष्ण के मित्र थे, जहाँ भी कृष्ण जाते थे, अर्जुन भी जाते थे। पर अंतर यह था कि कृष्ण को सबकुछ याद रहता था जबकि जीव जैसे अर्जुन, जो कि भगवान के मिनट कण होते हैं, भूल जाते थे। इसलिए कहा जाता है कि भगवान का सतर्कता कभी कम नहीं होती। भगवद् गीता (15.15) में इसकी पुष्टि भी होती है। सर्वस्य च अहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृति ज् ज्ञानम् अपोहनं च: सभी जीवों के हृदय में सर्वोच्च देव व्यक्तित्व अपने परमात्मा रूप में हमेशा विद्यमान रहते हैं और उनसे ही स्मृति, ज्ञान और विस्मृति आती है। इस श्लोक में सुपर्णम शब्द से भी इसका संकेत मिलता है, जिसका अर्थ है "मित्र"। इस प्रकार श्वेताश्वतर उपनिषद (4.6) में कहा गया है, द्वा सुपर्ण-सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते: एक ही वृक्ष पर दो पक्षी मित्र की तरह बैठे हैं। एक पक्षी वृक्ष का फल खा रहा है और दूसरा केवल निगरानी कर रहा है। यह निगरानी करने वाला पक्षी खाने वाले पक्षी का मित्र के रूप में हमेशा मौजूद रहता है और उसे उन चीज़ों की याद दिलाता है जिन्हें वह करना चाहता है। इस प्रकार यदि हम अपने दैनिक मामलों में सर्वोच्च देव व्यक्तित्व को शामिल करते हैं, तो हम उन्हें देख सकते हैं या कम से कम उनकी उपस्थिति को हर जगह देख सकते हैं।

शब्द चक्षुष यस्य न रिश्यति का अभिप्राय यह है कि यद्यपि हम उसे नहीं देख सकते, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह हमें नहीं देख सकता। न ही ब्रह्मांडीय अभि­व्यक्ति के नष्ट हो जाने पर उसका अंत होता है। इस संदर्भ में यह उदहारण दिया गया है कि जब सूर्य मौजूद होता है तो सूर्य का प्रकाश मौजूद होता है, लेकिन जब सूर्य मौजूद नहीं होता है या जब हम सूर्य को नहीं देख सकते हैं, तो इसका यह अर्थ नहीं कि सूर्य नष्ट हो गया है। सूर्य वहीं है, लेकिन हम उसे नहीं देख सकते हैं। इसी तरह, यद्यपि हम अपने वर्तमान अंधेरे में, अपने ज्ञान की कमी के कारण, परम-पुरुषोत्तम ईश्वर को नहीं देख सकते हैं, फिर भी वह हमेशा मौजूद है और हमारी गतिविधियों को देख रहा है। परमात्मा के रूप में, वह साक्षी और सलाह­कार है (उपद्रष्टा और अनुमंता)। इसलिए, आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों का पालन करके तथा अधिकृत शास्त्रों का अध्ययन करके, कोई भी यह समझ सकता है कि ईश्वर हमारे सामने मौजूद है, हमारी हर बात को देख रहा है, यद्यपि उसके दर्शन के लिए हमारी आँखें नहीं हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)