इमं विवस्वते योगं
प्रोक्तावान्हम् अव्ययम्
विवस्वान् मानवे प्राहा
मनुर् इक्ष्वाकुवेऽब्रवीत्
"मैंने इस अव्यय योग-विद्या का उपदेश सूर्यदेव विवस्वान को दिया, और विवस्वान ने मानव-जाति के पिता मनु को दिया, और मनु ने आगे चलकर इसका उपदेश इक्ष्वाकु को दिया।" स्वयंभुव मनु और वैवस्वत मनु के कर्तव्य समान हैं। वैवस्वत मनु सूर्यदेव विवस्वान से उत्पन्न हुए थे, और इनके पुत्र थे इक्ष्वाकु, पृथ्वी के राजा। चूँकि मनु को मानवता का मूल पिता माना जाता है, अतः मानव समाज को उनके उपदेशों का पालन करना चाहिए।
स्वयंभुव मनु का निर्देश है कि न केवल आध्यात्मिक संसार में, बल्कि यहाँ तक कि इस भौतिक संसार में भी जो कुछ भी है, वह सब भगवान का ही है, जो सर्वत्र पराचेतन रूप में विद्यमान हैं। जैसा कि भगवद-गीता (13.3) में बताया गया है: क्षेत्र-ज्ञं चापि माँ विद्धि सर्व-क्षेत्रेषु भारत: अर्थात हर क्षेत्र में- दूसरे शब्दों में, प्रत्येक शरीर में- भगवान अतिआत्मा के रूप में विद्यमान हैं। व्यक्तिगत आत्मा को एक शरीर दिया जाता है, जिसमें वह रहता और भगवान के निर्देशों के अनुसार कार्य करता है, इसलिए भगवान प्रत्येक शरीर में विद्यमान भी हैं। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हम स्वतंत्र हैं, बल्कि यह समझना चाहिए कि हमें भगवान की कुल संपत्ति का एक निश्चित हिस्सा आवंटित किया गया है।
इस समझ से पूर्ण साम्यवाद का उदय होगा। साम्यवादी अपने राष्ट्रों की दृष्टि से सोचते हैं, पर यहाँ निर्देश दिए गए आध्यात्मिक साम्यवाद केवल राष्ट्रव्यापी ही नहीं, बल्कि सार्वभौमिक है। कुछ भी किसी राष्ट्र या किसी व्यक्तिगत व्यक्ति का नहीं है; सब कुछ भगवान का है। यही इस श्लोक का अर्थ है। आत्मवास्यमिदं विश्वं: इस ब्रह्मांड के भीतर जो कुछ भी है, वह भगवान का ही है। आधुनिक साम्यवादी सिद्धांत, और साथ ही संयुक्त राष्ट्र का विचार भी इस समझ से सुधारा जा सकता है- या कि वास्तव में दुरुस्त किया जा सकता है- कि हर चीज़ भगवान की है। भगवान हमारी बुद्धि की रचना नहीं हैं; बल्कि उन्होंने हमें रचा है। आत्मवास्यमिदं विश्वं। ईशावास्यमिदं सर्वं। यह सार्वभौमिक साम्यवाद दुनिया की सारी समस्याओं का समाधान कर सकता है।
वैदिक साहित्य से सीखना चाहिए कि हमारी देह भी व्यक्तिगत आत्मा की संपत्ति नहीं है, बल्कि उसके कर्मों के अनुसार उसे दी गई है। कर्माण दैवनेत्रेण जन्तुर्देहोपपत्तये। 8,400,000 विभिन्न शारीरिक रूप मशीनें हैं, जो व्यक्तिगत आत्मा को दी गई हैं। इसका भगवद-गीता (18.61) में भी समर्थन है:
ईश्वरः सर्वभूतानां
हृद्देशे ऽर्जुन तिष्ठति
भ्रामयन् सर्वभूतानि
यन्त्रारूढानि मायया
"हे अर्जुन! भगवान सर्व प्राणियों के हृदय में विराजमान हैं, और वे सभी प्राणियों की गतिविधियों का संचालन कर रहे हैं, जो मायिक भौतिक ऊर्जा से बनी हुई मशीन में बैठे हुए-से हैं।" भगवान, अतिआत्मा के रूप में, प्रत्येक प्राणी के हृदय में विराजमान हैं और उनकी विविध इच्छाओं को देखते हैं। भगवान अत्यंत दयालु हैं कि वे जीव को उपयुक्त शरीरों में अनेक प्रकार की इच्छाओं का आनंद लेने का अवसर देते हैं, जो कुछ और नहीं बल्कि मशीनें हैं (यन्त्रारूढानि मायया)। ये मशीनें बाह्य ऊर्जा के भौतिक तत्वों से निर्मित होती हैं, और इस प्रकार जीव अपनी इच्छाओं के अनुसार भोगता या भोगता है। यह अवसर अतिआत्मा द्वारा दिया जाता है।
सब कुछ परमेश्वर का है, इसलिए किसी को दूसरे की संपत्ति नहीं हड़पनी चाहिए। हमारे अंदर बहुत सी चीज़ों को बनाने की एक चाह होती है। खासकर आजकल, हम गगनचुंबी इमारतों का निर्माण कर रहे हैं और अन्य भौतिक सुविधाओं का विकास कर रहे हैं। हालाँकि, हमें यह जानना चाहिए कि गगनचुंबी इमारतों और मशीनों के घटकों का निर्माण स्वयं परमेश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं कर सकता। संपूर्ण विश्व पाँच भौतिक तत्वों (तेजो-वारि-मृदां यथा विनिमय:) के संयोजन के सिवाय और कुछ नहीं है। एक गगनचुंबी इमारत पृथ्वी, जल और अग्नि का एक रूपांतरण है। पृथ्वी और जल को मिलाकर आग से ईंटें बनाई जाती हैं, और एक गगनचुंबी इमारत अनिवार्य रूप से ईंटों का एक ऊँचा निर्माण है। हालाँकि ईंटों का निर्माण मनुष्य द्वारा किया जा सकता है, लेकिन ईंटों के घटकों का निर्माण नहीं किया जा सकता। बेशक, एक निर्माता के रूप में, मनुष्य स्वयं परमेश्वर से वेतन स्वीकार कर सकता है। यहाँ इसी का उल्लेख किया गया है: तेना त्यक्तेन भुंजीथाः। कोई भी एक बड़ी गगनचुंबी इमारत का निर्माण कर सकता है, लेकिन न तो निर्माण करने वाला, न ही व्यापारी और न ही कार्यकर्ता स्वामित्व का दावा कर सकता है। स्वामित्व उस व्यक्ति का है जिसने भवन के लिए व्यय किया है। स्वयं परमेश्वर ने जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि और आकाश का निर्माण किया है, और कोई भी इसका उपयोग कर सकता है और वेतन ले सकता है (तेना त्यक्तेन भुंजीथाः)। हालाँकि, कोई भी स्वामित्व का दावा नहीं कर सकता। यही सिद्धांत साम्यवाद है। महान भवनों के निर्माण की हमारी प्रवृत्ति का उपयोग केवल विशाल और मूल्यवान मंदिरों के निर्माण के लिए किया जाना चाहिए जिसमें स्वयं परमेश्वर की मूर्ति स्थापित की जाए। तब निर्माण के प्रति हमारी अभिलाषा पूरी होगी।
चूँकि सभी संपत्ति स्वयं परमेश्वर की है, इसलिए सब कुछ भगवान को अर्पित किया जाना चाहिए, और हमें केवल प्रसाद लेना चाहिए (तेना त्यक्तेन भुंजीथाः)। हमें हमारी आवश्यकता से अधिक लेने के लिए आपस में नहीं लड़ना चाहिए। जैसा कि नारद ने महाराज युधिष्ठिर से कहा था:
यावद् भृयेत जठरं
तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्
अधिकं योऽभिमन्येत
स स्तेनो दंडमर्हति
"कोई भी उतनी ही संपत्ति का स्वामित्व का दावा कर सकता है जितनी शरीर और आत्मा को एक साथ बनाए रखने के लिए आवश्यक होती है, लेकिन जो व्यक्ति उससे अधिक के स्वामित्व की इच्छा करता है उसे चोर माना जाना चाहिए, और वह प्रकृति के नियमों के अनुसार दंडित होने का पात्र है।" (भाग. 7.14.8) बेशक, हमें खाने, सोने, मिलन और सुरक्षा (आहार-निद्रा-भय-मैथुन) में रहने की आवश्यकता है, लेकिन चूँकि परमेश्वर, स्वयं परमेश्वर ने, पक्षियों और मधुमक्खियों के लिए जीवन की ये आवश्यकताएं प्रदान की हैं, तो मनुष्य के लिए क्यों नहीं? आर्थिक विकास की कोई आवश्यकता नहीं है; सब कुछ प्रदान किया गया है। इसलिए किसी को यह समझना चाहिए कि सब कुछ कृष्ण का है, और इस विचार के साथ, कोई प्रसाद ले सकता है। हालाँकि, यदि कोई दूसरों के आवंटनों में हस्तक्षेप करता है, तो वह चोर है। हमें वास्तव में हमें ज़रूरत से ज़्यादा चीज़ें स्वीकार नहीं करनी चाहिए। इसलिए, यदि संयोग से हमें प्रचुर मात्रा में धन प्राप्त होता है, तो हमें हमेशा यह सोचना चाहिए कि यह स्वयं परमेश्वर का है। कृष्ण चेतना में हमें पर्याप्त धन मिल रहा है, लेकिन हमें कभी नहीं सोचना चाहिए कि धन हमारा है; यह स्वयं परमेश्वर का है और इसे श्रमिकों, भक्तों में समान रूप से वितरित किया जाना चाहिए। किसी भी भक्त को यह दावा नहीं करना चाहिए कि कोई भी धन या संपत्ति उसकी है। यदि कोई सोचता है कि इस विशाल ब्रह्मांड के किसी भी हिस्से की संपत्ति किसी की है, तो उसे चोर माना जाना चाहिए और प्रकृति के नियमों के अनुसार उसे दंडित किया जाना चाहिए। दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरात्यया: कोई भी भौतिक प्रकृति की निगरानी को पार नहीं कर सकता है या भौतिक प्रकृति से अपने इरादों को छिपा नहीं सकता है। यदि मानव समाज यह दावा करता है कि ब्रह्मांड की संपत्ति, आंशिक या पूर्ण रूप से, मानव जाति की है, तो पूरे मानव समाज को चोरों के समाज के रूप में शापित किया जाएगा और प्रकृति के नियमों के अनुसार दंडित किया जाएगा।
