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श्लोक 7.6.8  |
दुरापूरेण कामेन मोहेन च बलीयसा ।
शेषं गृहेषु सक्तस्य प्रमत्तस्यापयाति हि ॥ ८ ॥ |
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| अनुवाद |
| जिसका मन और इन्द्रियाँ काबू में नहीं हैं, वह अतृप्त कामेच्छाओं और प्रबल मोह के कारण पारिवारिक जीवन में बहुत अधिक आसक्त होता जाता है। ऐसे पागल व्यक्ति के जीवन के शेष वर्ष भी बर्बाद हो जाते हैं, क्योंकि उन वर्षों में भी वह अपने को भक्ति में लगा नहीं पाता। |
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| जिसका मन और इन्द्रियाँ काबू में नहीं हैं, वह अतृप्त कामेच्छाओं और प्रबल मोह के कारण पारिवारिक जीवन में बहुत अधिक आसक्त होता जाता है। ऐसे पागल व्यक्ति के जीवन के शेष वर्ष भी बर्बाद हो जाते हैं, क्योंकि उन वर्षों में भी वह अपने को भक्ति में लगा नहीं पाता। |
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