| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान » अध्याय 6: प्रह्लाद द्वारा अपने असुर सहपाठियों को उपदेश » श्लोक 3 |
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| | | | श्लोक 7.6.3  | सुखमैन्द्रियकं दैत्या देहयोगेन देहिनाम् ।
सर्वत्र लभ्यते दैवाद्यथा दु:खमयत्नत: ॥ ३ ॥ | | | | | | अनुवाद | | प्रह्लाद महाराज बोले : हे दानव वंश में जन्मे मेरे मित्रों, इंद्रियों की वस्तुओं से शरीर के संपर्क से जो सुख मिलता है, वह सुख किसी भी योनि में अपने पिछले कर्मों के अनुसार प्राप्त किया जा सकता है। ऐसा सुख प्रयास के बिना ही स्वतः प्राप्त हो जाता है, जिस प्रकार हमें दुख प्राप्त होता है। | | | | प्रह्लाद महाराज बोले : हे दानव वंश में जन्मे मेरे मित्रों, इंद्रियों की वस्तुओं से शरीर के संपर्क से जो सुख मिलता है, वह सुख किसी भी योनि में अपने पिछले कर्मों के अनुसार प्राप्त किया जा सकता है। ऐसा सुख प्रयास के बिना ही स्वतः प्राप्त हो जाता है, जिस प्रकार हमें दुख प्राप्त होता है। | | ✨ ai-generated | | |
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