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श्लोक 7.5.55  |
अथ ताञ्श्लक्ष्णया वाचा प्रत्याहूय महाबुध: ।
उवाच विद्वांस्तन्निष्ठां कृपया प्रहसन्निव ॥ ५५ ॥ |
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| अनुवाद |
| तब प्रह्लाद महाराज, जो सचमुच परम विद्वान पुरुष थे, अपने सहपाठियों के समक्ष आये और अत्यंत मधुर वाणी में उनसे बोले। उन्होंने मुस्कुराते हुए भौतिकतावादी जीवन-शैली की व्यर्थता के बारे में बताना शुरू किया। उन पर अत्यंत दयालु होने के कारण उन्होंने उन्हें इस तरह उपदेश दिए। |
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| तब प्रह्लाद महाराज, जो सचमुच परम विद्वान पुरुष थे, अपने सहपाठियों के समक्ष आये और अत्यंत मधुर वाणी में उनसे बोले। उन्होंने मुस्कुराते हुए भौतिकतावादी जीवन-शैली की व्यर्थता के बारे में बताना शुरू किया। उन पर अत्यंत दयालु होने के कारण उन्होंने उन्हें इस तरह उपदेश दिए। |
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