श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 5: हिरण्यकशिपु का साधु पुत्र प्रह्लाद महाराज  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  7.5.3 
यत्तत्र गुरुणा प्रोक्तं शुश्रुवेऽनुपपाठ च ।
न साधु मनसा मेने स्वपरासद्ग्रहाश्रयम् ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
प्रह्लाद निश्चित रूप से राजनीति और अर्थशास्त्र जैसे विषयों को पढ़ते और दोहराते अवश्य थे, लेकिन साथ ही वे यह भी समझते थे राजनीति में किसी को मित्र और किसी को शत्रु माना जाता है। इसलिए वे इस विषय में खास रुचि नहीं रखते थे।
 
प्रह्लाद निश्चित रूप से राजनीति और अर्थशास्त्र जैसे विषयों को पढ़ते और दोहराते अवश्य थे, लेकिन साथ ही वे यह भी समझते थे राजनीति में किसी को मित्र और किसी को शत्रु माना जाता है। इसलिए वे इस विषय में खास रुचि नहीं रखते थे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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