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श्लोक 7.5.16  |
आनीयतामरे वेत्रमस्माकमयशस्कर: ।
कुलाङ्गारस्य दुर्बुद्धेश्चतुर्थोऽस्योदितो दम: ॥ १६ ॥ |
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| अनुवाद |
| अरे! मेरी छड़ी जल्दी से लाओ! यह प्रह्लाद हमारे नाम और यश को नुकसान पहुंचा रहा है। अपनी खराब बुद्धि के कारण वह दानवों के कुल में अंगारे के समान बन गया है। अब उसे राजनीतिक कूटनीति के चार प्रकारों में से चौथे प्रकार से उपचारित किये जाने की आवश्यकता है। |
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| अरे! मेरी छड़ी जल्दी से लाओ! यह प्रह्लाद हमारे नाम और यश को नुकसान पहुंचा रहा है। अपनी खराब बुद्धि के कारण वह दानवों के कुल में अंगारे के समान बन गया है। अब उसे राजनीतिक कूटनीति के चार प्रकारों में से चौथे प्रकार से उपचारित किये जाने की आवश्यकता है। |
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