श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 5: हिरण्यकशिपु का साधु पुत्र प्रह्लाद महाराज  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  7.5.12 
स यदानुव्रत: पुंसां पशुबुद्धिर्विभिद्यते ।
अन्य एष तथान्योऽहमिति भेदगतासती ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
जब परमेश्वर हमारे भक्ति भाव से संतुष्ट हो जाते हैं, तो हम पंडित बन जाते हैं और शत्रु, मित्र और अपने में कोई भेद नहीं करते हैं। हम समझदारी से यह सोचते हैं कि हम सभी ईश्वर के नित्य दास हैं, इसलिए हम एक-दूसरे से भिन्न नहीं हैं।
 
जब परमेश्वर हमारे भक्ति भाव से संतुष्ट हो जाते हैं, तो हम पंडित बन जाते हैं और शत्रु, मित्र और अपने में कोई भेद नहीं करते हैं। हम समझदारी से यह सोचते हैं कि हम सभी ईश्वर के नित्य दास हैं, इसलिए हम एक-दूसरे से भिन्न नहीं हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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