श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 5: हिरण्यकशिपु का साधु पुत्र प्रह्लाद महाराज  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  7.5.1 
श्रीनारद उवाच
पौरोहित्याय भगवान्वृत: काव्य: किलासुरै: ।
षण्डामर्कौ सुतौ तस्य दैत्यराजगृहान्तिके ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
महामुनि नारद ने कहा : हिरण्यकशिपु और अन्य असुरों ने शुक्रचार्य को यज्ञों और अनुष्ठानों को संपन्न कराने के लिए अपने पुरोहित के रूप में चुना। शुक्रचार्य के दो पुत्र, षण्ड और अमर्क, हिरण्यकशिपु के महल के पास ही रहते थे।
 
महामुनि नारद ने कहा : हिरण्यकशिपु और अन्य असुरों ने शुक्रचार्य को यज्ञों और अनुष्ठानों को संपन्न कराने के लिए अपने पुरोहित के रूप में चुना। शुक्रचार्य के दो पुत्र, षण्ड और अमर्क, हिरण्यकशिपु के महल के पास ही रहते थे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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