| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान » अध्याय 13: सिद्ध पुरुष का आचरण » श्लोक 8 |
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| | | | श्लोक 7.13.8  | न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान्नैवाभ्यसेद् बहून् ।
न व्याख्यामुपयुञ्जीत नारम्भानारभेत्क्वचित् ॥ ८ ॥ | | | | | | अनुवाद | | संन्यासी को चाहिए कि वह न तो अनेक शिष्य एकत्र करने के लिए भौतिक लाभों का बहकावा दे, न व्यर्थ ही अनेक पुस्तकें पढ़े, न जीवनयापन के साधन के रूप में व्याख्यान दे। न व्यर्थ ही भौतिक ऐश्वर्य बढ़ाने का कभी कोई प्रयास करे। | | | | संन्यासी को चाहिए कि वह न तो अनेक शिष्य एकत्र करने के लिए भौतिक लाभों का बहकावा दे, न व्यर्थ ही अनेक पुस्तकें पढ़े, न जीवनयापन के साधन के रूप में व्याख्यान दे। न व्यर्थ ही भौतिक ऐश्वर्य बढ़ाने का कभी कोई प्रयास करे। | | ✨ ai-generated | | |
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