श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 13: सिद्ध पुरुष का आचरण  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  7.13.26 
तत्रापि दम्पतीनां च सुखायान्यापनुत्तये ।
कर्माणि कुर्वतां द‍ृष्ट्वा निवृत्तोऽस्मि विपर्ययम् ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
इस मानवीय जीवन में, पुरुष और महिलाएं कामुकता के सुख के लिए एकजुट होते हैं, परन्तु वास्तविक अनुभव से हमने देखा है कि उनमें से कोई भी सुखी नहीं है। इसलिये विपरीत परिणामों को देखते हुए मैंने भौतिकवादी गतिविधियों में भाग लेना बंद कर दिया है।
 
इस मानवीय जीवन में, पुरुष और महिलाएं कामुकता के सुख के लिए एकजुट होते हैं, परन्तु वास्तविक अनुभव से हमने देखा है कि उनमें से कोई भी सुखी नहीं है। इसलिये विपरीत परिणामों को देखते हुए मैंने भौतिकवादी गतिविधियों में भाग लेना बंद कर दिया है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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