श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 13: सिद्ध पुरुष का आचरण  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.13.2 
बिभृयाद् यद्यसौ वास: कौपीनाच्छादनं परम् ।
त्यक्तं न लिङ्गाद् दण्डादेरन्यत् किञ्चिदनापदि ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
संन्यासी को अपने शरीर ढंकने के लिए वस्त्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। वह सिर्फ़ एक लंगोटी पहन सकता है, वो भी सिर्फ़ जरूरत होने पर। उसे दंड का भी उपयोग नहीं करना चाहिए। वह केवल एक दंड और कमंडल अपने साथ रख सकता है।
 
संन्यासी को अपने शरीर ढंकने के लिए वस्त्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। वह सिर्फ़ एक लंगोटी पहन सकता है, वो भी सिर्फ़ जरूरत होने पर। उसे दंड का भी उपयोग नहीं करना चाहिए। वह केवल एक दंड और कमंडल अपने साथ रख सकता है।
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