श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 12: पूर्ण समाज : चार आध्यात्मिक वर्ग  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  7.12.17 
वानप्रस्थस्य वक्ष्यामि नियमान्मुनिसम्मतान् ।
यानास्थाय मुनिर्गच्छेद‍ृषिलोकमुहाञ्जसा ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजा, अब मैं वानप्रस्थ की विशेषताओं का वर्णन करूँगा, जो कि गृहस्थ जीवन से मुक्ति है। वानप्रस्थ के नियमों और विधानों का कड़ाई से पालन करते हुए वह आसानी से महर्लोक नामक ऊपरी लोक में पहुँच सकता है।
 
हे राजा, अब मैं वानप्रस्थ की विशेषताओं का वर्णन करूँगा, जो कि गृहस्थ जीवन से मुक्ति है। वानप्रस्थ के नियमों और विधानों का कड़ाई से पालन करते हुए वह आसानी से महर्लोक नामक ऊपरी लोक में पहुँच सकता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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