श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 12: पूर्ण समाज : चार आध्यात्मिक वर्ग  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  7.12.16 
एवं विधो ब्रह्मचारी वानप्रस्थो यतिर्गृही ।
चरन्विदितविज्ञान: परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार नियमित रूप से अभ्यास करते हुए व्यक्ति चाहे ब्रह्मचारी आश्रम में रहे, गृहस्थ आश्रम में हो, वानप्रस्थ या संन्यास आश्रम में हो, उसे सृष्टि में परमेश्वर की व्याप्ति का एहसास कराना चाहिए। ऐसा करने से वह परम सत्य का अनुभव कर सकता है।
 
इस प्रकार नियमित रूप से अभ्यास करते हुए व्यक्ति चाहे ब्रह्मचारी आश्रम में रहे, गृहस्थ आश्रम में हो, वानप्रस्थ या संन्यास आश्रम में हो, उसे सृष्टि में परमेश्वर की व्याप्ति का एहसास कराना चाहिए। ऐसा करने से वह परम सत्य का अनुभव कर सकता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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