श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 10: भक्त शिरोमणि प्रह्लाद  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  7.10.45 
धर्मो भागवतानां च भगवान्येन गम्यते ।
आख्यानेऽस्मिन्समाम्नातमाध्यात्मिकमशेषत: ॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
जिन धर्म के सिद्धांतों से भगवान को वास्तव में समझा जा सकता है, वो भागवत धर्म कहलाता है। इस लिए इस कथा में इन सिद्धांतों के समावेश होने से वास्तविक अध्यात्म का बहुत अच्छे से वर्णन हुआ है।
 
The principles of religion by which God can be truly understood is called Bhagwat Dharma. Therefore, by including these principles in this story, real spirituality has been described well.
तात्पर्य
धर्म के सिद्धांतों के द्वारा ही कोई भगवान, ब्रह्म (भगवान का अव्यक्तिगत पहलू) और परमात्मा (भगवान का स्थानीय पहलू) को समझ सकता है। जब कोई इन सभी सिद्धांतों से भली-भाँति परिचित हो जाता है, तो वह भक्त बन जाता है और भागवत-धर्म का पालन करता है। साधनाओं की शृंखला में आध्यात्मिक गुरु प्रह्लाद महाराज ने सलाह दी थी कि यह भागवत-धर्म छात्रों को उनकी शिक्षा की शुरुआत से ही (कौमार आचरेत प्राज्ञो धर्मान भगवतान इह) सिखाया जाना चाहिए। भगवान के विज्ञान को समझना ही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है। श्रवणं कीर्तनं विष्णोः। व्यक्ति को केवल भगवान विष्णु और उनके विभिन्न अवतारों के बारे में सुनना और वर्णन करना चाहिए। इसलिए प्रह्लाद महाराज और भगवान नरसिम्हादेव के बारे में यह कथन आध्यात्मिक, पारलौकिक विषयों का समुचित वर्णन करता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)