श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  6.9.18 
येनावृता इमे लोकास्तपसा त्वाष्ट्रमूर्तिना ।
स वै वृत्र इति प्रोक्त: पाप: परमदारुण: ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
उस अति भयानक असुर ने, जो कि त्वष्टा का ही पुत्र था, अपने तपोबल के ज़रिए सभी लोकों को ढक दिया था। इसीलिए उसका नाम वृत्र पड़ा, जो हर चीज़ को ढकने वाला था।
 
उस अति भयानक असुर ने, जो कि त्वष्टा का ही पुत्र था, अपने तपोबल के ज़रिए सभी लोकों को ढक दिया था। इसीलिए उसका नाम वृत्र पड़ा, जो हर चीज़ को ढकने वाला था।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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